जिंदगी के आखिरी पड़ाव तक किसानों की आवाज़ बने रहे सत्यपाल मलिक, 79 वर्ष की उम्र में निधन
India News Live,Digital Desk : जम्मू-कश्मीर, गोवा, बिहार और मेघालय जैसे राज्यों के पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक का मंगलवार, 5 अगस्त 2025 को 79 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वह लंबे समय से बीमार थे और दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके निधन पर दुख व्यक्त करते हुए ट्विटर पर लिखा, "सत्यपाल मलिक जी के निधन से दुखी हूँ। इस दुख की घड़ी में मेरी संवेदनाएँ उनके परिवार और समर्थकों के साथ हैं। ओम शांति।"
सत्यपाल मलिक: एक राजनीतिक व्यक्तित्व
सत्यपाल मलिक एक ऐसा नाम थे जिन्होंने अपने लंबे राजनीतिक जीवन में कई महत्वपूर्ण पदों पर काम किया। उनका जन्म 1946 में उत्तर प्रदेश के बागपत ज़िले में हुआ था और उन्होंने अलग-अलग पार्टियों से अपना राजनीतिक सफ़र शुरू किया। कांग्रेस, जनता दल और लोकदल जैसी पार्टियों में रहने के बाद, वे भाजपा में शामिल हो गए। हालाँकि, उनकी पहचान हमेशा एक जाट नेता और किसान-प्रेमी चेहरे के रूप में रही। वे खुद को राम मनोहर लोहिया की विचारधारा से जुड़ा मानते थे और पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे। किसानों के अधिकारों और ग्रामीण मुद्दों पर उनकी स्पष्ट राय हमेशा चर्चा में रही।
Saddened by the passing away of Shri Satyapal Malik Ji. My thoughts are with his family and supporters in this hour of grief. Om Shanti.
— Narendra Modi (@narendramodi) August 5, 2025
किसान आंदोलन और केंद्र सरकार से मतभेद
राज्यपाल के रूप में अपना कार्यकाल समाप्त होने के बाद, वे किसान आंदोलन के समर्थन में खुलकर सामने आए। जब मोदी सरकार ने तीन कृषि कानून लागू किए, तो मलिक ने खुलकर किसानों का समर्थन किया। इसी दौरान उनके और केंद्र सरकार के रिश्तों में तनाव बढ़ गया। इसके अलावा, 2023 में जब महिला पहलवानों ने भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ धरना दिया, तो सत्यपाल मलिक ने भी उनका समर्थन किया और उन्हें व्यक्तिगत मदद का आश्वासन दिया।
सीबीआई का आरोपपत्र और भ्रष्टाचार के आरोप
मई 2024 में सत्यपाल मलिक का नाम फिर से सुर्खियों में आया, जब सीबीआई ने कथित भ्रष्टाचार के एक मामले में उनके खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया। यह मामला जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ जिले में कीरू जलविद्युत परियोजना के सिविल ठेके से जुड़ा था। उन पर ठेका देने में अनियमितता और भ्रष्टाचार का आरोप लगाया गया था। इन आरोपों के कारण वे अपने राजनीतिक जीवन के अंतिम दौर में भी विवादों में रहे।