ईरान के साथ मिलकर अमेरिका को मात देने की तैयारी? जानें क्या है 'तख्तापलट' वाला प्लान

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India News Live,Digital Desk : पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के बीच दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' (Strait of Hormuz) को लेकर एक सनसनीखेज दावा सामने आया है। भू-राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चीन इस संकट का फायदा उठाकर होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपना नियंत्रण स्थापित कर सकता है। अगर ऐसा होता है, तो यह वैश्विक ऊर्जा बाजार में अमेरिका के प्रभुत्व के खिलाफ चीन का एक बड़ा 'तख्तापलट' (Coup) साबित होगा।

क्यों है 'स्ट्रेट ऑफ होर्मुज' पर चीन की नजर?

दुनिया की कुल तेल आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी संकरे जलमार्ग से गुजरता है। 28 फरवरी 2026 को ईरान पर हुए अमेरिकी और इजरायली हमलों के बाद से यह मार्ग प्रभावी रूप से बंद है, जिससे वैश्विक तेल कीमतों में भारी उछाल आया है।

रणनीतिक बढ़त: मार्सेलस इन्वेस्टमेंट्स के फाउंडर सौरभ मुखर्जी के अनुसार, चीन अब ईरान के साथ मिलकर इस जलमार्ग पर अपना नियंत्रण बनाने की कोशिश करेगा।

ऊर्जा सुरक्षा: चीन दुनिया का सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक है। होर्मुज पर नियंत्रण का मतलब है कि दुनिया के एक बड़े हिस्से की तेल सप्लाई की चाबी चीन के हाथ में होगी।

ईरान और चीन का '25 साल वाला' सीक्रेट गेम

चीन और ईरान के बीच बढ़ती नजदीकी अमेरिका के लिए सिरदर्द बनी हुई है:

प्रतिबंधों की अनदेखी: चीन अमेरिकी प्रतिबंधों को दरकिनार कर ईरान से लगातार सस्ता तेल खरीद रहा है।

रणनीतिक साझेदारी: 2021 में दोनों देशों के बीच 25 साल का रणनीतिक समझौता हुआ था। इसमें चीनी निवेश के बदले ईरान ने उसे रियायती दरों पर तेल देने का वादा किया है।

बंदरगाहों का जाल: चीन ने यूएई, ओमान, ईरान और पाकिस्तान (ग्वादर) के बंदरगाहों में भारी निवेश किया है, जिससे उसकी सैन्य और व्यापारिक पहुंच खाड़ी क्षेत्र में काफी बढ़ गई है।

अमेरिका OUT, चीन IN? क्या बदल जाएंगे समीकरण?

कार्नेगी के विशेषज्ञ अब्दुल्ला बाबूद का मानना है कि खाड़ी देशों में अमेरिका की घटती सक्रियता चीन के लिए नए रास्ते खोल रही है।

सुरक्षा गारंटर: हालांकि अभी चीन के पास इतनी सैन्य ताकत नहीं है कि वह पूरी तरह अमेरिका की जगह ले सके, लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर, टेलीकॉम और रक्षा क्षेत्र में उसका प्रभाव लगातार बढ़ रहा है।

पाइपलाइन और रेल नेटवर्क: चीन ऐसी वैकल्पिक व्यवस्थाएं तैयार कर रहा है जिससे होर्मुज पर निर्भरता कम हो सके और उसका व्यापार निर्बाध चलता रहे।

भारत पर क्या होगा असर?

सौरभ मुखर्जी ने चेतावनी दी है कि यह शक्ति की लड़ाई लंबी खिंच सकती है। भारत के लिए इसके तीन बड़े नुकसान हो सकते हैं:

महंगा तेल: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ेंगे।

कमजोर रुपया: डॉलर के मुकाबले रुपया और गिर सकता है, जिससे आयात महंगा होगा।

ब्याज दरें: बढ़ती महंगाई को रोकने के लिए बैंक ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर सकते हैं, जिससे आम आदमी की ईएमआई (EMI) बढ़ जाएगी।

क्या यह 'ऑयल वॉर' कई महीनों तक चलेगा?

विशेषज्ञों का आकलन है कि यह कोई मामूली विवाद नहीं है जो कुछ दिनों में सुलझ जाए। यह 'तेल और ताकत' की वो जंग है जिसमें चीन एक मूक खिलाड़ी (Silent Player) बनकर उभरा है। यदि चीन और ईरान मिलकर होर्मुज को नियंत्रित करने में सफल रहे, तो भविष्य में वैश्विक राजनीति का केंद्र वाशिंगटन से खिसककर बीजिंग की ओर जा सकता है।