'पीएम मोदी ने बहुत पहले ही चेताया था, हमने नहीं सुनी बात': बेल्जियम के प्रधानमंत्री ने कबूल की यूरोप की सबसे बड़ी भूल
वैश्विक व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) में किसी एक देश पर अत्यधिक आर्थिक और सामरिक निर्भरता को लेकर यूरोपीय संघ (EU) में अब गंभीर आत्ममंथन शुरू हो गया है। भारत दौरे पर आए बेल्जियम के प्रधानमंत्री बार्ट डी वेवर (Bart De Wever) ने इस मुद्दे पर एक बड़ा और बेबाक बयान देकर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में हलचल मचा दी है।
भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) द्वारा नई दिल्ली में आयोजित एक उच्चस्तरीय कार्यक्रम को संबोधित करते हुए बेल्जियम के प्रधानमंत्री ने खुलकर स्वीकार किया कि यूरोप ने विदेशी सामान और खासकर चीन पर जरूरत से ज्यादा निर्भर होकर एक बहुत बड़ी ऐतिहासिक भूल की है। उन्होंने कहा कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस खतरे और इसके नतीजों के बारे में यूरोप को वर्षों पहले ही आगाह कर दिया था, लेकिन यूरोप ने तब उस चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया।
'पीएम मोदी ने पहले ही दी थी चेतावनी, हमने बात नहीं सुनी'
बार्ट डी वेवर ने अपने संबोधन में स्वीकार किया कि यूरोप को अब एक बेहद कड़वे सच का सामना करना पड़ रहा है:
देर से आई अक्ल: बेल्जियम के पीएम ने कहा, "हम उन समान चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, जहां आर्थिक निर्भरता को एक हथियार (Weaponised) की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। भारत इस इतिहास को पहले ही जी चुका है। आपके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूरोप को इस खतरे को लेकर बहुत पहले ही सतर्क कर दिया था, लेकिन उन्हें अनसुना कर दिया गया। अब यूरोप को देर से ही सही, लेकिन इस सच्चाई का अहसास हो रहा है और हम अब सुन रहे हैं।""
डंपिंग जोन नहीं बनने देंगे: उन्होंने नाम लिए बिना सीधे तौर पर चीन पर निशाना साधते हुए कहा कि यूरोप को किसी देश के उत्पादों का 'डंपिंग ग्राउंड' नहीं बनने दिया जा सकता। लागत से भी कम कीमत पर सस्ते और घटिया सामान को यूरोप के बाजारों में बेरोकटोक आने दिया गया, जिसने धीरे-धीरे स्थानीय यूरोपीय उद्योगों की रीढ़ को तोड़ दिया और उन्हें पंगु बना दिया।
'अगर लिस्ट में भारत नहीं, तो आप बुनियादी बात खो रहे हैं'
बेल्जियम के प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि विखंडित होती वैश्विक अर्थव्यवस्था के बीच यूरोप अब बहुपक्षवाद (Multilateralism) और सम्मान आधारित साझेदारी की तलाश कर रहा है:
नंबर 1 पार्टनर है भारत: उन्होंने कहा, "दुनिया की किस बड़ी और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के साथ हम ऐसा भरोसेमंद रिश्ता बना सकते हैं? अगर किसी देश की प्राथमिक सूची में भारत का नाम नहीं है, तो वह सबसे बुनियादी बात खो रहा है। भारत हमारी सूची में सबसे शीर्ष पायदान पर है।""
टैरिफ की ब्लैकमेलिंग नहीं चलेगी: अमेरिका का परोक्ष संदर्भ देते हुए उन्होंने यह भी कहा कि यूरोप को ऐसे साथियों की आवश्यकता है जो सम्मान से सहयोग करें, न कि ऐसे जो आज टैरिफ लगाएं, कल हटा दें और अपनी बात न मानने पर फिर से टैरिफ की धमकी दें।
यूरोप के बाजारों पर चीन का भारी शिकंजा: 1360 अरब यूरो का घाटा
आंकड़ों के अनुसार, यूरोप वर्तमान में चीन के साथ भारी व्यापार असंतुलन का सामना कर रहा है:
व्यापार का बड़ा अंतर: चीन यूरोप को सालाना लगभग 560 अरब यूरो का निर्यात (इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी आदि) करता है, जबकि यूरोप का चीन को निर्यात महज 200 अरब यूरो तक सीमित है।
कड़े फैसलों की तैयारी: यूरोप लगभग 1,360 अरब यूरो के संचयी व्यापार घाटे के दबाव में है। यही कारण है कि यूरोपीय संघ ने अक्टूबर तक की समयसीमा तय की है कि यदि चीनी उत्पादों की डंपिंग नहीं रुकी, तो कड़े टैरिफ लगाए जाएंगे।
भारत के लिए बड़ा अवसर: यूरोप-भारत मुक्त व्यापार समझौता (FTA)
यूरोपीय संघ द्वारा आपूर्ति श्रृंखला को चीन से हटाकर अन्य विश्वसनीय लोकतांत्रिक देशों की ओर मोड़ने (China+1 Strategy) की इस नीति से भारत को बहुत बड़ा रणनीतिक लाभ मिलने जा रहा है:
मांग पूरी करने में भारत सक्षम: 27 देशों वाले यूरोपीय संघ की जरूरतों को भारत अपने मजबूत विनिर्माण, फार्मा, टेक्सटाइल और तकनीकी कौशल के दम पर बखूबी पूरा कर सकता है।
मुक्त व्यापार समझौता (FTA): भारत और यूरोपीय संघ के बीच हुए मुक्त व्यापार समझौते के इस साल के अंत तक लागू होने की पूरी संभावना है। केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने भी इस समझौते को दोनों पक्षों के किसानों, स्टार्टअप्स और उद्योग जगत के लिए 'विन-विन' स्थिति बताया है।
व्यापारिक आंकड़े: वर्तमान में भारत और यूरोप के बीच लगभग 136 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार है, जिसमें भारत का निर्यात 75 अरब डॉलर के आसपास है। चीनी सामान पर लगने वाली यूरोपीय पाबंदियों से भारतीय निर्यातकों के लिए नए दरवाजे खुलेंगे।
बेल्जियम के प्रधानमंत्री का यह बयान यह साबित करता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 'आत्मनिर्भरता' और 'सुरक्षित आपूर्ति श्रृंखला' का संदेश अब वैश्विक स्तर पर विकसित देशों की भी मजबूरी और बुनियादी नीति बनता जा रहा है।