फोन पर रखते ही दूसरा गैजेट होने लगता है चार्ज! रिवर्स वायरलेस चार्जिंग और कैसे काम करता है यह जादुई साइंस
स्मार्टफोन की दुनिया में टेक्नोलॉजी इतनी तेजी से बदल रही है कि जो चीजें कभी साइंस फिक्शन फिल्मों का हिस्सा लगा करती थीं, वे आज हमारी जेब में मौजूद मोबाइल का आम फीचर बन चुकी हैं। कुछ साल पहले तक फोन को बिना तार के चार्ज करना यानी वायरलेस चार्जिंग (Wireless Charging) ही लोगों के लिए किसी चमत्कार जैसा था। लेकिन अब टेक कंपनियों ने इससे भी एक कदम आगे बढ़कर 'रिवर्स वायरलेस चार्जिंग' (Reverse Wireless Charging) की सुविधा दे दी है। इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि आपको किसी चार्जर, केबल या बिजली के बोर्ड की जरूरत नहीं पड़ती। बस अपने फोन के पिछले हिस्से (Back Panel) पर स्मार्टवॉच, वायरलेस ईयरबड्स या किसी दूसरे फोन को रखिए और वह तुरंत चार्ज होना शुरू हो जाता है। बहुत से लोग इसे देखकर हैरान रह जाते हैं कि आखिर बिना किसी फिजिकल कनेक्शन के एक फोन से दूसरे डिवाइस में करंट कैसे ट्रांसफर हो जाता है। आइए समझते हैं इस जादुई लगने वाली तकनीक के पीछे का असली वैज्ञानिक नियम और यह फोन के भीतर कैसे काम करता है।
क्या है रिवर्स वायरलेस चार्जिंग और कैसे हुई इसकी शुरुआत?
साधारण वायरलेस चार्जिंग में आपका स्मार्टफोन बिजली लेने वाले 'रिसीवर' (Receiver) की तरह काम करता है, जिसे आप किसी प्लग-इन चार्जिंग पैड पर रखकर चार्ज करते हैं। वहीं रिवर्स वायरलेस चार्जिंग ठीक इसके विपरीत काम करती है। जब आप इस फीचर को चालू करते हैं, तो आपका स्मार्टफोन खुद एक पावर बैंक या 'ट्रांसमीटर' (Transmitter) बन जाता है।
यानी आपका फोन अपनी बैटरी से पावर निकालकर दूसरे छोटे गैजेट्स जैसे ब्लूटूथ ईयरबड्स (TWS), स्मार्टवॉच या यहां तक कि अपने दोस्त के डिस्चार्ज हो चुके फोन में भेजने लगता है। सैमसंग इसे 'वायरलेस पावरशेयर' (Wireless PowerShare) कहता है, जबकि अन्य एंड्रॉयड और फ्लैगशिप ब्रांड्स इसे रिवर्स चार्जिंग या वायरलेस शेयरिंग के नाम से पेश करते हैं।
इलेक्ट्रोमैग्नेटिक इंडक्शन: इसके पीछे का असली साइंस
रिवर्स वायरलेस चार्जिंग कोई जादू नहीं, बल्कि भौतिक विज्ञान (Physics) के 19वीं सदी के बेहद मशहूर नियम 'इलेक्ट्रोमैग्नेटिक इंडक्शन' (Electromagnetic Induction) पर आधारित है, जिसकी खोज महान वैज्ञानिक माइकल फैराडे ने की थी।
फोन के पिछले ग्लास या प्लास्टिक पैनल के ठीक नीचे कॉपर यानी तांबे का एक बहुत ही बारीक और चपटा तार का छल्ला (Copper Coil) लगा होता है। सामान्य चार्जिंग के दौरान यह कॉइल करंट लेती है, लेकिन रिवर्स चार्जिंग ऑन करते ही फोन की बैटरी इस कॉइल में बिजली (Alternating Current) छोड़ना शुरू कर देती है।
जब तांबे के इस छल्ले में करंट दौड़ता है, तो फोन की सतह के आसपास एक अदृश्य 'इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड' (चुंबकीय क्षेत्र) तैयार हो जाता है। अब जैसे ही आप इसके ऊपर कोई ऐसा डिवाइस रखते हैं जिसमें खुद की रिसीवर कॉइल लगी हो (जैसे ईयरबड्स का केस या दूसरा वायरलेस फोन), तो वह चुंबकीय क्षेत्र दूसरे डिवाइस के छल्ले से टकराता है। इस टकराव से दूसरे डिवाइस की कॉइल में अपने आप बिजली का करंट पैदा हो जाता है और वह बिजली सीधे उस गैजेट की बैटरी में जाकर स्टोर होने लगती है। यानी हवा और कांच के आर-पार बिना किसी तार के ऊर्जा का प्रवाह हो जाता है।
दोनों डिवाइसों का क्यूई (Qi) सर्टिफाइड होना क्यों है जरूरी?
वायरलेस और रिवर्स चार्जिंग को सुरक्षित बनाने के लिए दुनियाभर की टेक कंपनियों ने एक वैश्विक मानक तय किया है, जिसे 'क्यूई स्टैंडर्ड' (Qi Standard) कहा जाता है।
जब आप किसी डिवाइस को फोन की पीठ पर रखते हैं, तो दोनों गैजेट्स की कॉइल पहले एक-दूसरे से डिजिटल सिग्नल के जरिए बात करती हैं। फोन यह जांचता है कि ऊपर रखा गया गैजेट सुरक्षित है या नहीं, उसकी बैटरी कितनी खाली है और उसे कितने वॉट की बिजली चाहिए। अगर दोनों डिवाइस Qi स्टैंडर्ड को सपोर्ट करते हैं, तभी करंट बहना शुरू होता है। यदि आप फोन पर कोई सिक्का, चाबी या लोहे की चीज रख देंगे, तो फोन का सेंसर उसे तुरंत पहचान लेगा और ओवरहीटिंग या स्पार्किंग से बचने के लिए चार्जिंग को खुद-ब-खुद ब्लॉक कर देगा।
स्पीड और पावर: क्या यह केबल जितनी तेज है?
रिवर्स वायरलेस चार्जिंग को मुख्य रूप से इमरजेंसी के वक्त काम आने वाली सुविधा (Emergency Feature) के तौर पर डिजाइन किया गया है, न कि रोजमर्रा के भारी इस्तेमाल के लिए।
केबल चार्जर जहां 30 वॉट से लेकर 120 वॉट तक की तूफानी स्पीड देते हैं, वहीं रिवर्स वायरलेस चार्जिंग की स्पीड आमतौर पर 4.5 वॉट से 10 वॉट के बीच ही सीमित होती है। इसका कारण यह है कि वायरलेस तरीके से बिजली ट्रांसफर करते वक्त हवा और दूरी की वजह से लगभग 20 से 30 प्रतिशत ऊर्जा गर्मी (Heat) के रूप में नष्ट हो जाती है। इतनी धीमी स्पीड बड़े स्मार्टफोन को तेजी से चार्ज करने के लिए भले ही काफी न हो, लेकिन छोटे गैजेट्स जैसे 300 से 500 एमएएच (mAh) की बैटरी वाले ईयरबड्स और स्मार्टवॉच को 15 से 20 मिनट में इतना चार्ज कर देती है कि वे घंटों चल सकें।
क्या इससे फोन की बैटरी जल्दी खराब होती है?
यूजर्स के मन में अक्सर यह डर रहता है कि इस फीचर के इस्तेमाल से उनके महंगे फोन की बैटरी लाइफ कम तो नहीं हो जाएगी।
तकनीकी रूप से, जब आप रिवर्स चार्जिंग ऑन करते हैं, तो फोन की बैटरी सामान्य से थोड़ी ज्यादा गर्म होती है। अत्यधिक गर्मी लीथियम-आयन बैटरी के स्वास्थ्य के लिए अच्छी नहीं मानी जाती। हालांकि, कंपनियों ने इसके लिए फोन के सॉफ्टवेयर में कड़े सुरक्षा नियम बनाए हैं। अधिकांश फोनों में यह व्यवस्था होती है कि अगर आपके मेन फोन की बैटरी 25% या 30% से नीचे आ जाती है, तो रिवर्स चार्जिंग अपने आप बंद हो जाती है ताकि आपका अपना फोन स्विच ऑफ न हो जाए। यदि आप इसका इस्तेमाल कभी-कभार जरूरत पड़ने पर करते हैं, तो फोन की बैटरी पर कोई बड़ा नकारात्मक असर नहीं पड़ता।
इस फीचर का सही इस्तेमाल कैसे करें?
रिवर्स चार्जिंग का सबसे अच्छा परिणाम पाने के लिए हमेशा अपने फोन के भारी या मोटे बैक कवर (Mobile Case) को हटा दें, क्योंकि मोटा कवर दोनों कॉइल्स के बीच की दूरी बढ़ा देता है जिससे चार्जिंग रुक सकती है। इसके अलावा, चार्ज होने वाले गैजेट को फोन के ठीक बीचो-बीच (Center) रखें, जहां चार्जिंग कॉइल मौजूद होती है। जब तक गैजेट चार्ज हो रहा हो, तब तक फोन पर भारी गेमिंग या वीडियो स्ट्रीमिंग करने से बचें ताकि फोन अत्यधिक गर्म न होने पाए।