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September 28 2026 03:35 am

संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान ने फिर रोया अपना दुखड़ा; 'ऑपरेशन सिंदूर' की मार को याद कर कांपे हुक्मरान

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न्यूयॉर्क में आयोजित संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के 81वें उच्चस्तरीय सत्र के वैश्विक मंच पर पाकिस्तान का पुराना डर, बेबसी और सीमा पार भारतीय पराक्रम का खौफ एक बार फिर खुलकर सामने आ गया है। वैश्विक मंचों पर अक्सर कश्मीर और क्षेत्रीय शांति का राग अलापने वाले पाकिस्तान ने इस बार सीधे तौर पर भारतीय सेना द्वारा सीमा पार किए गए निर्णायक सैन्य एक्शन—'ऑपरेशन सिंदूर'—के प्रभाव और उससे मची खलबली को अंतरराष्ट्रीय पटल पर कबूल किया है। पाकिस्तानी नेतृत्व ने संयुक्त राष्ट्र के हॉल में दुनिया भर के राजनयिकों के सामने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दखल का जिक्र करते हुए कहा कि अगर उस नाजुक मोड़ पर ट्रंप प्रशासन आगे न आता, तो उपमहाद्वीप में एक बहुत बड़ा और अकल्पनीय विनाश हो चुका होता। पाकिस्तान के इस आधिकारिक बयान ने यह साबित कर दिया है कि भारत के कड़े सामरिक जवाब ने इस्लामाबाद की सैन्य रणनीति की चूलें हिला दी थीं।

'अगर ट्रंप न आते तो तबाही तय थी': पाकिस्तानी हुक्मरानों का कबूलनामा

संयुक्त राष्ट्र के मंच से संबोधित करते हुए पाकिस्तानी पक्ष ने उस तनावपूर्ण दौर को याद किया जब दोनों परमाणु संपन्न देशों के बीच रिश्ते बेहद चरम और विस्फोटक स्थिति में पहुंच गए थे। पाकिस्तान ने कहा कि भारतीय सुरक्षा बलों की आक्रामक और रणनीतिक कार्रवाई के बाद दोनों देशों के बीच टकराव उस मुहाने पर पहुंच गया था जहां से वापसी लगभग असंभव दिख रही थी।

पाकिस्तानी नेतृत्व ने कहा, "हम उस समय वाशिंगटन और विशेष रूप से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के तत्काल और प्रभावी राजनयिक हस्तक्षेप के आभारी हैं, जिन्होंने समय रहते मध्यस्थता कर दक्षिण एशिया को एक पूर्ण और भयावह विनाश के गर्त में गिरने से बचा लिया।" पाकिस्तान के इस बयान को कूटनीतिक हलकों में उसकी अपनी रणनीतिक लाचारी और तीसरे पक्ष की गुहार लगाने की पुरानी आदत के रूप में देखा जा रहा है।

'ऑपरेशन सिंदूर' का वो खौफ, जिसने तोड़ी कमर

गौरतलब है कि सीमा पार से प्रायोजित आतंकी साजिशों और भारतीय नागरिकों व जवानों को निशाना बनाने वाली कायराना हरकतों के जवाब में भारतीय सशस्त्र बलों ने 'ऑपरेशन सिंदूर' को अंजाम दिया था। इस उच्च-सटीक (High-Precision) और सुनियोजित सैन्य अभियान के तहत भारतीय बलों ने नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा के पार स्थित प्रमुख आतंकी ठिकानों, लॉन्च पैड्स और उन्हें संरक्षण देने वाले बुनियादी ढांचे को तबाह कर दिया था।

इस सर्जिकल कार्रवाई की गति और मारक क्षमता इतनी अप्रत्याशित थी कि पाकिस्तानी सेना के रणनीतिकारों को जवाबी तैयारी का संभलने का मौका तक नहीं मिला था। सीमा पार हुए उस नुकसान और रणनीतिक झटके का असर ऐसा रहा कि महीनों बीत जाने के बाद भी पाकिस्तानी हुक्मरान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उस खौफ से उबर नहीं पाए हैं।

भारत का सख्त रुख: द्विपक्षीय मसले पर तीसरे पक्ष का कोई स्थान नहीं

पाकिस्तानी नेतृत्व द्वारा संयुक्त राष्ट्र में डोनाल्ड ट्रंप के नाम का सहारा लेने और अमेरिकी दखल की दुहाई देने पर भारत ने अपना पारंपरिक और दृढ़ रुख पूरी मजबूती से दोहराया है। भारतीय राजनयिकों का साफ कहना है कि भारत और पाकिस्तान के बीच का हर मामला पूरी तरह से द्विपक्षीय है, जिसमें शिमला समझौते और लाहौर घोषणापत्र के तहत किसी भी तीसरे देश या मध्यस्थता की रत्ती भर गुंजाइश नहीं है।

भारतीय पक्ष ने स्पष्ट किया कि जब भी भारत की संप्रभुता, अखंडता और निर्दोष नागरिकों की सुरक्षा पर कोई आंच आएगी, तो देश की सेनाएं बिना किसी झिझक के सीमा पार जाकर आतंकवाद की जड़ों पर प्रहार करेंगी। आतंकवाद और बातचीत एक साथ नहीं चल सकते, और पाकिस्तान का यह सार्वजनिक विलाप केवल उसके भीतर बैठे डर का प्रमाण है।

अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में अलग-थलग पड़ा पाकिस्तान

संयुक्त राष्ट्र महासभा के इस सत्र में पाकिस्तानी दावों को वैश्विक समुदाय से कोई खास तवज्जो नहीं मिली है। विश्लेषकों का मानना है कि अपनी आंतरिक आर्थिक कंगाली, राजनीतिक अस्थिरता और बलूचिस्तान व खैबर पख्तूनख्वा में बढ़ते घरेलू विद्रोह से जूझ रहा पाकिस्तान अब केवल अंतरराष्ट्रीय सहानुभूति बटोरने के लिए 'परमाणु विनाश' और 'तीसरे पक्ष के बचाव' का हौव्वा खड़ा कर रहा है। बहरहाल, यूएन के सबसे बड़े मंच पर 'ऑपरेशन सिंदूर' और ट्रंप के बचाव का यह सार्वजनिक रोना यह रेखांकित कर गया कि नए भारत की आतंकवाद-विरोधी आक्रामक नीति ने दुश्मन की चौखट पर अपनी अमिट छाप छोड़ दी है।