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September 26 2026 08:35 pm

ट्रंप से अस्थायी डील हो भी गई तो क्या परमाणु कार्यक्रम से पीछे हटेगा ईरान? तेहरान की दो टूक- संप्रभुता और तकनीक पर नहीं झुकेंगे!

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मध्य-पूर्व में जारी गहरे सैन्य तनाव, होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच वाशिंगटन और तेहरान के बीच कूटनीतिक हलचलों ने एक बार फिर जोर पकड़ लिया है। संयुक्त राष्ट्र महासभा के सत्र के दौरान और कतर-ओमान की मध्यस्थता से अमेरिका और ईरान के बीच एक नए समझौते (डील) के विकल्प तलाशे जा रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जहां लगातार यह दावा कर रहे हैं कि ईरान को हर हाल में अपने परमाणु कार्यक्रम पर सरेंडर करना होगा, वहीं तेहरान के भीतर से आ रहे संकेत बिल्कुल उलट तस्वीर पेश कर रहे हैं। रक्षा विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि यदि ट्रंप प्रशासन के साथ किसी तरह का युद्धविराम या प्रतिबंध हटाने का समझौता (डील) हो भी जाता है, तब भी ईरान अपने परमाणु ढांचे, यूरेनियम संवर्धन की क्षमता और दीर्घकालिक तकनीकी संप्रभुता पर पूरी तरह झुकने के मूड में नहीं है।

ट्रंप का कड़ा अल्टीमेटम बनाम तेहरान की 'अस्तित्व रक्षा' की नीति

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट कर रखा है कि किसी भी स्थायी शांति समझौते की पहली और गैर-परक्राम्य (Non-negotiable) शर्त यह होगी कि ईरान अपने 60% संवर्धित यूरेनियम का भंडार अमेरिका या किसी तीसरे देश को सौंपे, भूमिगत परमाणु सुविधाओं को सीमित करे और किसी भी सूरत में परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश न करे। वाशिंगटन का आकलन है कि कड़े आर्थिक प्रतिबंधों, तेल निर्यात पर पाबंदियों और सैन्य दबाव के चलते ईरान घुटने टेकने पर मजबूर होगा।

लेकिन ईरानी सत्ता के शीर्ष गलियारों—विशेषकर सुप्रीम लीडर के कार्यालय और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC)—का सोचना इसके ठीक विपरीत है। ईरान के रणनीतिकारों का मानना है कि परमाणु क्षमता हासिल करने की दहलीज (Nuclear Threshold) पर बने रहना ही उनके देश के लिए सबसे बड़ा 'अस्तित्व कवच' (Deterrence) है। लीबिया के कर्नल गद्दाफी और यूक्रेन का उदाहरण देते हुए ईरानी कट्टरपंथी खेमा अक्सर यह तर्क देता है कि जिन देशों ने पश्चिमी सुरक्षा गारंटियों पर भरोसा करके अपना परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह छोड़ दिया, अंततः उनका हश्र बेहद भयानक हुआ। ऐसे में कोई भी अस्थायी आर्थिक राहत या ट्रंप के हस्ताक्षर उन्हें अपनी मुख्य सुरक्षा ढाल को पूरी तरह त्यागने के लिए राजी नहीं कर सकते।

2018 का अनुभव: वाशिंगटन के वादों पर तेहरान का अविश्वास

ईरान के पीछे न हटने की सबसे बड़ी वजह वाशिंगटन के वादों पर उसका गहरा अविश्वास है। साल 2015 में हुआ ऐतिहासिक परमाणु समझौता (JCPOA) ओबामा प्रशासन के दौर में मुकम्मल हुआ था, लेकिन 2018 में अपने पहले कार्यकाल के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने एक झटके में अमेरिका को उस समझौते से बाहर निकाल लिया था और ईरान पर 'अधिकतम दबाव' के कड़े प्रतिबंध थोप दिए थे।

तेहरान का कहना है कि जब एक अमेरिकी राष्ट्रपति के किए गए अंतरराष्ट्रीय समझौते को दूसरा राष्ट्रपति रद्दी की टोकरी में फेंक सकता है, तो वे केवल कागजी वादों के आधार पर दशकों की वैज्ञानिक मेहनत और अरबों डॉलर के निवेश से खड़े किए गए परमाणु ढांचे को कैसे नष्ट कर सकते हैं? ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने भी साफ किया है कि ईरान दबाव, धमकियों और एकतरफा शर्तों के आगे अपने संप्रभु अधिकारों का समर्पण कभी नहीं करेगा।

टैक्टिकल डील संभव, लेकिन तकनीक का ज्ञान खत्म नहीं हो सकता

वैज्ञानिक और तकनीकी दृष्टि से देखें तो ईरान अब उस मुकाम पर पहुंच चुका है जहां से उसे वापस भेजना लगभग असंभव है। ईरान के पास 60% तक संवर्धित सैकड़ों किलोग्राम यूरेनियम का भंडार है और उसके पास उन्नत सेंट्रीफ्यूज (IR-6) चलाने का पूरा ज्ञान मौजूद है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अधिक से अधिक ईरान फौरी तौर पर कुछ यूरेनियम को पतला (Dilute) करने या निरीक्षण की सीमित अनुमति देने जैसी 'रणनीतिक रियायत' पर सहमत हो सकता है—ताकि तेल प्रतिबंधों से राहत मिले और उसकी अर्थव्यवस्था सांस ले सके। लेकिन परमाणु बम बनाने की तकनीकी समझ और भूमिगत गुप्त ठिकानों का नेटवर्क नष्ट नहीं किया जा सकता। जैसे ही कोई नया तनाव उभरेगा या अमेरिका में सरकार बदलेगी, ईरान कुछ ही हफ्तों के भीतर दोबारा हथियार-ग्रेड (90%) संवर्धन की क्षमता हासिल कर सकता है।

क्षेत्रीय समीकरण और इजरायल की चिंता

इस गतिरोध में सबसे बड़ा पेच इजरायल का भी है। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने पहले ही साफ कर दिया है कि अमेरिका और ईरान के बीच कोई भी समझौता हो या न हो, तेल अवीव ईरान को किसी भी सूरत में परमाणु शक्ति नहीं बनने देगा। इजरायल का मानना है कि कोई भी 'सॉफ्ट डील' केवल ईरान को वक्त खरीदने (Buying Time) का मौका देगी।

कुल मिलाकर, ट्रंप प्रशासन यदि घरेलू राजनीतिक फायदे या गैस की कीमतें घटाने के लिए किसी समझौते पर पहुंच भी जाता है, तो वह केवल एक अस्थायी संघर्ष विराम साबित हो सकता है। जब तक दोनों देशों के बीच बुनियादी रणनीतिक अविश्वास और शासन के अस्तित्व का डर खत्म नहीं होता, तब तक ईरान अपने परमाणु रास्ते को पूरी तरह बंद करने पर कतई नहीं झुकेगा।