Owaisi's new political move stems from Seemanchal : बिहार से बंगाल तक राष्ट्रीय पहचान की तलाश

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India News Live,Digital Desk : बिहार का सीमांचल इलाका एक बार फिर असदुद्दीन ओवैसी की राजनीति का केंद्र बन गया है। उनकी पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) इस बार प्रदेश की 28 सीटों पर अपनी किस्मत आजमा रही है। पिछली बार पाँच सीटें जीतकर सभी को चौंकाने वाली पार्टी अब कहीं बड़ी योजना के साथ मैदान में उतरी है।

ओवैसी का लक्ष्य सिर्फ सीटें जीतना नहीं, बल्कि तेलंगाना से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाना है। उन्हें भरोसा है कि अगर सीमांचल में सफलता मिली, तो बंगाल और उत्तर प्रदेश में पार्टी का विस्तार आसान हो जाएगा।

राष्ट्रीय राजनीति पर नजर
राजनीतिक विश्लेषक अभय कुमार मानते हैं कि ओवैसी का फोकस सीमांचल तक सीमित नहीं है। वह AIMIM को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करना चाहते हैं। चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक, अगर पार्टी बिहार, बंगाल, असम और उत्तर प्रदेश जैसे प्रमुख राज्यों में राज्यस्तरीय पार्टी बन जाती है, तो उसे राष्ट्रीय दल का दर्जा मिल सकता है।

इसी दिशा में ओवैसी ने 2022 के उत्तर प्रदेश चुनाव में 95 उम्मीदवार उतारे थे। भले ही कोई सीट नहीं मिली, लेकिन 58 सीटों पर AIMIM ने कांग्रेस से ज़्यादा वोट पाए। इससे ओवैसी को आगे बढ़ने का आत्मविश्वास मिला।

सीमांचल और बंगाल की सामाजिक समानता
सीमांचल और बंगाल का सामाजिक व भौगोलिक ढांचा लगभग एक जैसा है। यहां मुस्लिम आबादी 40 से 60 प्रतिशत के बीच है और आर्थिक असमानता की स्थिति भी मिलती-जुलती है। ऐसे में अगर AIMIM सीमांचल में सफल होती है, तो यही मॉडल बंगाल में भी दोहराया जा सकता है। यह रणनीति खासकर उन युवाओं को आकर्षित कर सकती है जो पारंपरिक दलों से निराश हैं।

राजनीतिक चुनौतियों से घिरे ओवैसी
हालांकि, बिहार में ओवैसी की राह आसान नहीं है। पिछली बार विधानसभा में AIMIM ने राजद का समर्थन किया था, लेकिन बाद में राजद ने उनके चार विधायक तोड़ लिए। इसके बावजूद ओवैसी ने गठबंधन के लिए हाथ बढ़ाया, मगर तेजस्वी यादव ने उन्हें नज़रअंदाज़ कर मुकेश सहनी को प्राथमिकता दी।

बंगाल में भी 2021 में उन्होंने ममता बनर्जी से गठबंधन की कोशिश की थी, मगर वह नाकाम रही। अब बिहार में महागठबंधन उन्हें “वोट काटने वाली पार्टी” बताकर मुस्लिम वोटरों को चेतावनी दे रहा है, हालांकि ओवैसी इस आरोप को पूरी तरह खारिज करते हैं।

नया संदेश, नया दायरा
इस बार AIMIM ने बिहार में कुछ गैर-मुस्लिम प्रत्याशियों को टिकट देकर साफ संदेश दिया है कि पार्टी अब अपनी सीमाओं को तोड़कर व्यापक जनाधार बनाने की दिशा में है। यही फॉर्मूला बंगाल में भी अपनाया जा सकता है, जहां मुस्लिम वोट निर्णायक तो हैं, मगर तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन के बीच बंटे हुए हैं।

अगर सीमांचल में ओवैसी की रणनीति सफल होती है, तो यह न सिर्फ बिहार की सियासत में नई बिसात बिछाएगी, बल्कि AIMIM के लिए राष्ट्रीय राजनीति की नई सीढ़ी साबित हो सकती है।