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September 03 2026 09:31 pm

'हमारे पहाड़ पिघल रहे, हमें मुआवजा दे भारत और अमेरिका!' नेपाल में 1,250 मौतों के महाजलप्रलय के बाद काठमांडू का फूटा गुस्सा

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हिमालय की गोद में बसे पड़ोसी मुल्क नेपाल में हाल ही में आई प्रलयंकारी बाढ़, अप्रत्याशित बादल फटने और हिमनद झील फटने (GLOF) के चलते मची महाविभीषिका अब केवल एक मानवीय आपदा तक सीमित नहीं रही है, बल्कि इसने एक गंभीर और तीखे अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक व पर्यावरण विवाद का रूप ले लिया है। इस जलप्रलय में 1,250 से अधिक बेकसूर नागरिकों के जिंदा दफन होने, 4,000 से अधिक लोगों के लापता होने और अरबों डॉलर की राष्ट्रीय संपत्ति के मलबे में तब्दील हो जाने के बाद काठमांडू के हुक्मरानों और पर्यावरण नीति-निर्माताओं का सब्र जवाब दे गया है। नेपाल सरकार, वहां के शीर्ष पर्यावरणविदों और नागरिक संगठनों ने एक सुर में संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक मंचों पर आवाज उठाते हुए सीधे तौर पर संयुक्त राज्य अमेरिका, भारत और अन्य शीर्ष कार्बन उत्सर्जक देशों से भारी वित्तीय क्षतिपूर्ति (Climate Compensation) और तत्काल मुआवजे की दो-टूक मांग रख दी है। नेपाल का स्पष्ट कहना है कि दुनिया के सबसे गरीब और पर्वतीय देशों में शामिल नेपाल का वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में योगदान नगण्य यानी 0.1 प्रतिशत से भी कम है, किंतु अमेरिका के अनियंत्रित औद्योगीकरण और क्षेत्रीय महाशक्तियों के अंधाधुंध जीवाश्म ईंधन उपयोग के कारण हिमालय के शाश्वत ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिसकी भयावह मानवीय और आर्थिक कीमत नेपाल के निर्दोष नागरिकों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ रही है। इस तीखी मांग ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक गलियारों में एक नई खलबली मचा दी है।

नेपाल की दलील: 'दूसरों के किए पाप की सजा हम क्यों भुगतें?'

नेपाल के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों और काठमांडू के नीति-निर्माताओं ने अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के समक्ष जो आंकड़े प्रस्तुत किए हैं, वे वैश्विक जलवायु न्याय (Climate Justice) के खोखलेपन को उजागर करते हैं। संयुक्त राष्ट्र के वैश्विक जलवायु मंचों पर नेपाल के प्रतिनिधियों ने कड़े शब्दों में कहा कि हिमालय को 'दुनिया का तीसरा ध्रुव' (Third Pole) कहा जाता है। वैज्ञानिक अध्ययनों से सिद्ध हो चुका है कि वैश्विक औसत की तुलना में हिंदू कुश हिमालयी क्षेत्र तीन गुना तेजी से गर्म हो रहा है।

नेपाल सरकार का तर्क है कि उनके देश के पास न तो भारी विनिर्माण उद्योग हैं और न ही वे भारी मात्रा में कोयला या पेट्रोलियम जलाते हैं। इसके विपरीत, पश्चिमी महाशक्ति संयुक्त राज्य अमेरिका, जो ऐतिहासिक रूप से दुनिया का सबसे बड़ा कार्बन प्रदूषक रहा है, और तेजी से उभरती हुई औद्योगिक अर्थव्यवस्थाएं जैसे भारत व चीन, वैश्विक वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की विशाल मात्रा छोड़ रही हैं। इस वैश्विक वार्मिंग का सीधा प्रहार नेपाल के उन 3,000 से अधिक ग्लेशियरों पर पड़ रहा है जो समय से पहले पिघलकर विस्फोटक झीलों में बदल रहे हैं। काठमांडू का साफ कहना है कि हालिया आपदा कोई दैवीय प्रकोप नहीं, बल्कि 'मानव-निर्मित जलवायु नरसंहार' है, और अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण कानून के 'प्रदूषक भुगतान करे' (Polluter Pays Principle) सिद्धांत के तहत ऐतिहासिक और वर्तमान उत्सर्जक देशों को नेपाल के पुनर्निर्माण और मौतों का पाई-पाई मुआवजा देना होगा।

'लॉस एंड डैमेज' फंड और ऐतिहासिक जिम्मेदारी का सवाल: कर्ज नहीं, सीधे अनुदान की मांग

काठमांडू द्वारा उठाई गई इस मांग का कानूनी आधार संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क सम्मेलन (UNFCCC) के तहत स्थापित 'हानि और क्षति कोष' (Loss and Damage Fund) और पेरिस जलवायु समझौते का 'समान लेकिन विभेदित उत्तरदायित्व' (CBDR) सिद्धांत है। नेपाल ने स्पष्ट रूप से आगाह किया है कि इस बार वह अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं जैसे विश्व बैंक या एशियाई विकास बैंक (ADB) से मिलने वाले 'जलवायु ऋण' (Climate Loans) के जाल में नहीं फंसेगा।

नेपाल के योजना आयोग के अनुसार, हालिया बाढ़ ने देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के लगभग 5 से 7 प्रतिशत के बराबर की बुनियादी अवसंरचना को नष्ट कर दिया है। जलविद्युत परियोजनाएं ध्वस्त हो गई हैं, ट्रांसमिशन लाइनें टूट चुकी हैं और अंतरराष्ट्रीय राजमार्ग बह गए हैं। नेपाल का कहना है कि पहले से ही विदेशी कर्ज के बोझ तले दबे देश पर पुनर्निर्माण के नाम पर और अधिक कर्ज थोपना अन्यायपूर्ण है। नेपाल ने मांग की है कि अमेरिका और विकसित देश, जिन्होंने कॉप सम्मेलनों में खरबों डॉलर के जलवायु कोष का वादा किया था, वे इस कोष से तत्काल बिना किसी शर्त के अरबों डॉलर का सीधा अनुदान (Direct Grants) जारी करें। इसके साथ ही, भारत जैसे बड़े पड़ोसी देश से भी अपेक्षा की गई है कि वह एक साझा नदी बेसिन साझीदार के रूप में हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के पुनरुद्धार के लिए अपने बजट से नेपाल को सीधी वित्तीय सहायता प्रदान करे।

भारत और अमेरिका के सामने कूटनीतिक पशोपेश: सहायता और संप्रभुता के बीच संतुलन

नेपाल की इस खुली मांग ने नई दिल्ली और वाशिंगटन दोनों को एक अत्यंत असहज कूटनीतिक स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है। अमेरिका का ऐतिहासिक रुख हमेशा से यह रहा है कि वह किसी भी अंतरराष्ट्रीय संधि में 'कानूनी रूप से बाध्यकारी मुआवजा' या 'जलवायु क्षतिपूर्ति' (Climate Reparations) शब्द को स्वीकार नहीं करता, क्योंकि वाशिंगटन को डर है कि ऐसा करने पर दुनिया भर की अदालतों में अमेरिकी कंपनियों और सरकार पर खरबों डॉलर के मुकदमों की बाढ़ आ जाएगी। यही कारण है कि अमेरिकी विदेश विभाग आपदा के समय मानवीय राहत सामग्री और रेस्क्यू मदद तो तुरंत भेज देता है, लेकिन औपचारिक 'मुआवजे' के नाम पर एक डॉलर भी देने से बचता है।

दूसरी ओर, भारत के लिए यह स्थिति और भी अधिक संवेदनशील और जटिल है। भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर स्वयं ग्लोबल साउथ (विकासशील देशों) की आवाज रहा है और पश्चिमी देशों से जलवायु वित्त की मांग करता आया है। ऐसे में नेपाल द्वारा भारत का नाम उत्सर्जक देशों की कतार में अमेरिका के साथ खड़ा किया जाना भारतीय विदेश नीति के रणनीतिकारों को रास नहीं आ रहा है। भारतीय अधिकारियों का कहना है कि भारत ने हमेशा 'पड़ोसी प्रथम' नीति के तहत नेपाल को बड़े भाई की तरह बिना शर्त सहायता दी है। 2015 के महाभूकंप से लेकर हालिया बाढ़ त्रासदी तक, भारतीय वायुसेना, एनडीआरएफ के जवानों और चिकित्सा दलों ने अपनी जान जोखिम में डालकर नेपाली नागरिकों को बचाया है। भारत प्रतिवर्ष सैकड़ों करोड़ रुपये की अनुदान सहायता नेपाल के सड़क, अस्पताल और स्कूल निर्माण के लिए देता है। ऐसे में 'मुआवजे' जैसी कानूनी भाषा द्विपक्षीय संबंधों की आत्मीयता को ठेस पहुंचाने वाली मानी जा रही है।

नेपाल-भारत की साझी नदियां और यूपी के उन्नाव-गंगा बेसिन तक जल संकट की गूंज

नेपाल और भारत का भूगोल एक-दूसरे से इस कदर अविभाज्य है कि एक देश में बहने वाला पानी दूसरे देश का भाग्य तय करता है। नेपाल के पहाड़ों से निकलने वाली कोसी, गंडक (नारायणी), कर्णाली (घाघरा) और महाकाली (शारदा) नदियां सीधे भारत के उत्तरी मैदानों में प्रवेश करती हैं। हालिया त्रासदी में जब नेपाल के पहाड़ों पर बादल फटे, तो उस जलप्रलय की विभीषिका केवल काठमांडू या रसुवा तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसका सीधा असर बिहार और उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिलों पर पड़ा।

उत्तर प्रदेश के परिप्रेक्ष्य में देखें तो नेपाल की नदियों से आने वाला अतिरिक्त जलस्तर अंततः घाघरा और शारदा के जरिए गंगा की मुख्य धारा पर दबाव बढ़ाता है। राजधानी लखनऊ, औद्योगिक नगरी कानपुर और उससे सटे उन्नाव परिक्षेत्र के गंगा कछार में इसका असर प्रत्यक्ष रूप से देखा जाता है। उन्नाव के शुक्लागंज, जाजमऊ, परियर और गंगा बैराज के निचले इलाकों में मानसून के दिनों में कटान और जलभराव का खतरा नेपाल के जल-प्रवाह पर बहुत हद तक निर्भर करता है।

उन्नाव और कानपुर के जल-संसाधन विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल द्वारा मुआवजे की मांग के पीछे का एक बड़ा कारण यह भी है कि दोनों देशों के बीच दशकों पुराने नदी समझौते (जैसे कोसी और गंडक समझौता) पुराने पड़ चुके हैं। नेपाल के स्थानीय लोगों में यह धारणा बैठी हुई है कि बैराजों और तटबंधों का नियंत्रण भारत के पास होने से उनके निचले इलाकों में पानी रुकता है, जबकि भारतीय पक्ष का तर्क है कि यदि ये बैराज न हों, तो उत्तर प्रदेश और बिहार के दर्जनों जिले हर साल पूरी तरह जलमग्न हो जाएं। हिमालय में आ रहे ये तीव्र बदलाव यह संकेत दे रहे हैं कि अब दोनों देशों को आरोप-प्रत्यारोप और मुआवजे की राजनीति से ऊपर उठकर एक आधुनिक 'रियल-टाइम हाइड्रोलॉजिकल डेटा शेयरिंग' और संयुक्त जल प्रबंधन मॉडल पर काम करना होगा।

क्या अंतरराष्ट्रीय पटल पर पूरी होगी नेपाल की यह मांग?

जलवायु कूटनीति के विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नेपाल को 'मुआवजे' के रूप में सीधे भारत या अमेरिका से कोई नकद चेक मिलने की संभावना शून्य के बराबर है। अंतरराष्ट्रीय कानून संप्रभु राष्ट्रों को उनकी घरेलू आर्थिक गतिविधियों के आधार पर किसी अन्य देश को क्षतिपूर्ति देने के लिए बाध्य नहीं कर सकते। हालांकि, नेपाल का यह आक्रामक और मुखर रुख आगामी संयुक्त राष्ट्र जलवायु शिखर सम्मेलनों में एक बड़ा दबाव बिंदु (Leverage) अवश्य तैयार करेगा।

नेपाल, भूटान, मालदीव और अन्य छोटे द्वीपीय देश मिलकर अब एक मजबूत गुट बना रहे हैं जो दुनिया के अमीर और बड़े उत्सर्जक देशों को यह अहसास कराने में सफल हो रहे हैं कि उनकी विलासिता और जीवाश्म ईंधन की भूख नाजुक पारिस्थितिकी वाले देशों की जिंदगियों को लील रही है। यदि विकसित देशों ने अब भी लॉस एंड डैमेज फंड में वास्तविक धन नहीं डाला और विकासशील देशों को स्वच्छ ऊर्जा व आपदा-रोधी बुनियादी ढांचे के लिए मुफ्त तकनीक नहीं दी, तो हिमालय की चोटियों से शुरू हुआ यह जलप्रलय आने वाले दशकों में समूची मानवता के अस्तित्व को बहा ले जाने के लिए तैयार खड़ा है।