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September 09 2026 02:45 am

अब इंसान के दिमाग से चलेगा सुपरकंप्यूटर! सिंगापुर में तैयार हुआ दुनिया का पहला बायोलॉजिकल सर्वर; 1.6 करोड़ जिंदा ह्यूमन न्यूरॉन्स से होगी सुपरफास्ट कंप्यूटिंग

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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डेटा प्रोसेसिंग के बढ़ते विस्तार के बीच दुनिया भर के वैज्ञानिक पारंपरिक सिलिकॉन चिप्स की सीमाओं और उनके द्वारा खपत की जाने वाली भारी-भरकम बिजली की समस्या से जूझ रहे हैं। इसी वैश्विक संकट के बीच कंप्यूटिंग इतिहास का सबसे बड़ा और क्रांतिकारी आविष्कार सामने आया है। वैज्ञानिकों ने लैब में विकसित इंसानी दिमाग की कोशिकाओं (Human Brain Cells/Neurons) को कंप्यूटर हार्डवेयर से जोड़कर दुनिया का पहला 'बायोलॉजिकल सर्वर' और बायोकंप्यूटर तैयार करने में सफलता हासिल की है।

सिंगापुर में पेश की गई इस अभूतपूर्व तकनीक में कंप्यूटर के पारंपरिक सेमीकंडक्टर ट्रांजिस्टर की जगह जीवित मानव न्यूरॉन्स को प्रोसेसर्स के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। यह नई खोज न केवल सुपरकंप्यूटिंग की दुनिया को हमेशा के लिए बदल देगी, बल्कि एआई के प्रशिक्षण में लगने वाली ऊर्जा को 90 प्रतिशत से अधिक कम करने की क्षमता रखती है।

सिंगापुर में तैयार हुआ अनोखा बायोलॉजिकल सर्वर: 20 CL1 यूनिट्स का कमाल

वैज्ञानिकों की अंतरराष्ट्रीय टीम ने सिंगापुर में एक ऐसा उन्नत सर्वर रैक तैयार किया है जो पूरी तरह से अपने आप चलने वाला (Self-Operating) दुनिया का पहला बायोलॉजिकल सर्वर बन गया है।

इस पूरे सिस्टम में 20 CL1 बायो-यूनिट्स को एक साथ जोड़ा गया है।

प्रत्येक यूनिट में विशेष लैब वातावरण में स्टेम सेल्स से विकसित किए गए करीब 8 लाख जीवित ह्यूमन न्यूरॉन्स मौजूद हैं।

पूरे 20 यूनिट्स के सर्वर रैक में कुल मिलाकर लगभग 1.6 करोड़ जीवित न्यूरॉन्स एक साथ काम कर रहे हैं।

इन न्यूरॉन्स को मल्टी-इलेक्ट्रोड एरे (MEA) बायोचिप पर पोषक तत्वों और तरल माध्यम में जीवित रखा जाता है।

जब कंप्यूटर सॉफ्टवेयर के जरिए इन कोशिकाओं को डिजिटल और इलेक्ट्रिकल सिग्नल भेजे जाते हैं, तो न्यूरॉन्स न केवल उस सिग्नल को ग्रहण करते हैं बल्कि अपनी जैविक क्षमता से उस पर प्रतिक्रिया (Response) भी देते हैं।

बायोकंप्यूटिंग कैसे काम करती है? न्यूरॉन्स का 'सेल्फ-लर्निंग' मैकेनिज्म

पारंपरिक कंप्यूटर बाइनरी कोड (0 और 1) पर काम करते हैं और उनका डेटा स्टोरेज (मेमोरी) और प्रोसेसिंग यूनिट (CPU) अलग-अलग होता है। इसके विपरीत इंसानी दिमाग के न्यूरॉन्स और उनके बीच के सिनैप्स एक साथ प्रोसेसिंग और स्टोरेज दोनों काम करते हैं।

जब सिंगापुर के इस बायोलॉजिकल सर्वर में न्यूरॉन्स को कोई इनपुट सिग्नल मिलता है, तो वे जीवित मस्तिष्क की तरह आपस में नए नेटवर्क (Synaptic Connections) बनाना शुरू कर देते हैं। यदि कोई प्रतिक्रिया सही होती है, तो सिस्टम उन्हें एक सुसंगत इलेक्ट्रिकल सिग्नल (रिवॉर्ड) देता है, और यदि प्रतिक्रिया गलत होती है, तो उन्हें रैंडम नॉइज़ (सजा) दी जाती है। इस प्रक्रिया से न्यूरॉन्स बिना किसी बाहरी प्रोग्रामिंग के अपने आप गलतियों से सीखना (Autonomous Learning) शुरू कर देते हैं। कॉर्टिकल लैब्स द्वारा विकसित इस तकनीक ने पूर्व में लैब में विकसित न्यूरॉन्स को क्लासिक 'पोंग' (Pong) वीडियो गेम खेलना तक सिखा दिया था।

पारंपरिक सुपरकंप्यूटर बनाम इंसानी दिमाग: ऊर्जा का जादुई अंतर

वर्तमान समय में दुनिया के सबसे शक्तिशाली सुपरकंप्यूटर, जैसे अमेरिका के ओक रिज नेशनल लैब का 'फ्रंटियर' (Frontier), लगभग 1.1 एक्साफ्लॉप्स की गणना गति हासिल करते हैं, लेकिन उन्हें चलाने के लिए लगभग 21 मेगावाट (2.1 करोड़ वाट) बिजली की आवश्यकता होती है। यह बिजली एक पूरे छोटे शहर को रोशन करने के बराबर है।

इसके विपरीत, इंसानी दिमाग भी लगभग 1 एक्साफ्लॉप्स (प्रति सेकंड 100 करोड़ अरब गणनाएं) की क्षमता से काम करता है, लेकिन इसे चलने के लिए केवल 20 वाट ऊर्जा की आवश्यकता होती है—यानी एक छोटे से एलईडी बल्ब जितनी बिजली। सिलिकॉन आधारित चिप्स अब अपने भौतिक आकार की चरम सीमा (Moore's Law की सीमा) तक पहुंच चुके हैं। ऐसे में इंसानी दिमाग की कोशिकाओं पर आधारित 'बायोकंप्यूटिंग' और 'ऑर्गेनॉइड इंटेलिजेंस' (OI) दुनिया को एक ऐसी असीमित गणना शक्ति देने जा रही है जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना काम कर सकेगी।

दुनिया भर में चल रही है 'ब्रेन-स्केल' कंप्यूटिंग की महा-दौड़

सिंगापुर के इस हालिया कारनामे के अलावा दुनिया के कई अन्य विकसित देश भी इंसान के दिमाग से प्रेरित और जैविक चिप्स के निर्माण में जुटे हुए हैं:

ऑस्ट्रेलिया का 'डीपसाउथ' (DeepSouth) सुपरकंप्यूटर: वेस्टर्न सिडनी यूनिवर्सिटी के इंटरनेशनल सेंटर फॉर न्यूरोमॉर्फिक सिस्टम्स ने दुनिया का पहला ऐसा न्यूरोमॉर्फिक सुपरकंप्यूटर तैयार किया है जो मानव मस्तिष्क के 228 ट्रिलियन सिनैप्टिक ऑपरेशंस प्रति सेकंड की गति की हूबहू नकल करता है।

स्विट्जरलैंड का 'फाइनलस्पार्क' (FinalSpark): स्विस स्टार्टअप ने 16 ह्यूमन मिनी-ब्रेन ऑर्गेनॉइड्स को जोड़कर दुनिया का पहला कमर्शियल बायो-प्रोसेसर प्लेटफॉर्म लॉन्च किया है, जिस पर दुनिया भर के शोधकर्ता क्लाउड के जरिए एक्सपेरिमेंट्स कर रहे हैं।

अमेरिका का जॉन हॉपकिन्स विश्वविद्यालय: अमेरिकी वैज्ञानिक 'ऑर्गेनॉइड इंटेलिजेंस' (OI) के रोडमैप पर काम कर रहे हैं, जिसका लक्ष्य 1 करोड़ जीवित कोशिकाओं वाले 3D ब्रेन टिशूज से सुपर-बायोकंप्यूटर बनाना है।

सिर्फ एआई नहीं, मेडिकल साइंस और दवाओं की खोज में आएगा भूकंप

बायोलॉजिकल सुपरकंप्यूटर का सफल परीक्षण केवल कंप्यूटर या एआई तक सीमित नहीं रहने वाला है, बल्कि यह चिकित्सा विज्ञान में क्रांति ला देगा:

अल्जाइमर और पार्किंसंस का सटीक इलाज: जीवित इंसानी न्यूरॉन्स पर प्रयोग करके वैज्ञानिक यह सीधे देख सकेंगे कि दिमाग की कोशिकाएं कैसे नष्ट होती हैं और कौन सी दवा उन्हें ठीक कर सकती है।

बिना जानवरों पर टेस्ट किए नई दवाओं का निर्माण: किसी नई दवा का मानव मस्तिष्क पर क्या असर होगा, इसका परीक्षण चूहों या इंसानों के बजाय सीधे इन बायोचिप्स पर सुरक्षित रूप से किया जा सकेगा।

अल्ट्रा-फास्ट एआई मॉडल्स: मौजूदा लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स (LLMs) को ट्रेन करने में महीनों का समय और अरबों डॉलर का बिजली बिल आता है, जो बायोकंप्यूटर्स की मदद से कुछ ही घंटों और नाममात्र की ऊर्जा में पूरा हो सकेगा।

भविष्य की संभावनाएं और नैतिक चुनौतियां

यद्यपि लैब में विकसित ये न्यूरॉन्स कोई 'जागरूक दिमाग' या चेतना (Consciousness) नहीं रखते, फिर भी जीवित मानव कोशिकाओं को कंप्यूटर चिप्स की तरह इस्तेमाल करने को लेकर दुनिया भर के बायो-एथिक्स विशेषज्ञों के बीच बहस शुरू हो चुकी है। वैज्ञानिक यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि ये टिश्यूज केवल बुनियादी इनपुट-आउटपुट प्रोसेसिंग तक सीमित रहें और किसी प्रकार की पीड़ा या संवेदना महसूस न करें।

तमाम नैतिक सवालों के बीच, सिंगापुर और वैश्विक वैज्ञानिकों का यह कदम यह साबित करता है कि आने वाला कल केवल निर्जीव धातुओं और सिलिकॉन का नहीं, बल्कि 'बायोलॉजी और टेक्नोलॉजी' के अभूतपूर्व मेल का होगा। इंसानी दिमाग की असीम क्षमता जब मशीनों की रफ्तार के साथ जुड़ेगी, तो मानव सभ्यता तकनीक के एक ऐसे युग में प्रवेश करेगी जिसकी कल्पना अब तक केवल साइंस-फिक्शन फिल्मों में की जाती थी।