Ruckus over 'microphone' in Constitution Hall खरगे बोले, नड्डा को नहीं मिला मौका, फिर हुई तनातनी

Post

India News Live,Digital Desk : हाल ही में हुए लोकसभा चुनावों के बाद संसद में पहली बार कुछ ऐसा हुआ, जिसने एक बार फिर राजनीति में गहमागहमी बढ़ा दी। मौका था संविधान के 75 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित एक खास कार्यक्रम का, जहां देश के बड़े-बड़े नेता मौजूद थे। लेकिन इस दौरान उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ के एक फैसले ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा को नाराज़ कर दिया, जबकि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को बोलने का मौका मिल गया।

दरअसल, जब जगदीप धनखड़ ने नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को सदन में बोलने के लिए आमंत्रित किया, तो खरगे ने खुशी-खुशी अपनी बात रखी। धनखड़ ने साफ तौर पर कहा कि खरगे 'नेता प्रतिपक्ष' हैं और उनका एक 'विशेष स्थान' है, वे 'जनता की आवाज' हैं। यह सुनकर खरगे ने भी धनखड़ को धन्यवाद दिया और कहा कि नेता प्रतिपक्ष के रूप में उन्हें यह अवसर दिया जाना लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत है।

लेकिन जैसे ही खरगे ने अपनी बात खत्म की, BJP अध्यक्ष जेपी नड्डा, जो कि सांसद भी हैं, खड़े हो गए और बोलने की अनुमति मांगने लगे। नड्डा को उम्मीद थी कि उन्हें भी सदन को संबोधित करने का मौका मिलेगा। लेकिन उपराष्ट्रपति धनखड़ ने तुरंत उन्हें रोक दिया। धनखड़ ने कहा कि नड्डा इस कार्यक्रम के औपचारिक तौर पर शुरू होने से पहले ही बोल चुके थे। उन्होंने नियम का हवाला देते हुए कहा कि कार्यक्रम के औपचारिक हिस्से में सिर्फ वही लोग बोलेंगे, जिनके नाम लिस्ट में हैं, और नड्डा का नाम उस लिस्ट में नहीं था।

यह सुनकर जेपी नड्डा के चेहरे पर साफ तौर पर नाराज़गी दिखाई दी। उन्होंने कहा, "मैं सत्ताधारी दल का अध्यक्ष हूं। मैं एक सांसद भी हूं।" लेकिन धनखड़ अपने फैसले पर अटल रहे और नड्डा को बोलने की अनुमति नहीं मिली। भरी सभा में इस तरह से रोका जाना नड्डा के लिए थोड़ा असहज करने वाला पल था।

यह घटना दिखाती है कि संसद और संविधान हॉल में भी प्रोटोकॉल और नियमों को लेकर कितनी संवेदनशीलता होती है। नेता प्रतिपक्ष का पद कितना अहम है, यह भी इस घटना से स्पष्ट हुआ। कुल मिलाकर, यह एक ऐसा क्षण था जिसने संसदीय मर्यादाओं और राजनीतिक समीकरणों पर एक बार फिर बहस छेड़ दी।