Lord Shiva's Nataraja form : अपस्मार कथा और इसका आध्यात्मिक महत्व
- by Priyanka Tiwari
- 2025-12-22 17:36:00
India News Live,Digital Desk : नटराज भगवान शिव का वह स्वरूप है, जिसमें उन्हें नृत्य का देवता माना जाता है। भारतीय शास्त्रीय नृत्य शैलियों, जैसे भरतनाट्यम आदि में नटराज मुद्रा का विशेष महत्व है। नटराज की कथा में उनके पैर के नीचे दबा दानव अपस्मार (Apasmara) या मुयालका का वर्णन मिलता है।
अपस्मार की कथा
शिव पुराण के अनुसार, अपस्मार ने कठिन तपस्या कर ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त किया कि उसे कोई देवता, मनुष्य या राक्षस मार नहीं सकता। इस वरदान के बाद उसका अहंकार बढ़ गया और वह लोगों की बुद्धि और विवेक को निगलने लगा। इससे लोग पाप, मोह और अज्ञान के दलदल में फंसने लगे। देवता, ऋषि और साधक भी अपस्मार के प्रकोप से परेशान होने लगे।
भगवान शिव ने कैसे किया नियंत्रण
शिव की शरण में सभी परेशान होकर पहुंचे। ब्रह्मा जी के वरदान के कारण उसे सीधे मारना संभव नहीं था, इसलिए भगवान शिव ने आकाश तत्व को मंच बनाकर नटराज रूप में तांडव किया।
इस तांडव में पाँच क्रियाएं सम्मिलित थीं –
सृष्टि
संरक्षण
संहार
तिरोभाव (माया/भ्रम)
चेतना
जब अपस्मार नटराज के नृत्य में बाधा डालने लगा, तो शिव ने उसे अपने दाहिने पैर के नीचे कुचल दिया। इससे अपस्मार जीवित तो रहा, लेकिन वश में हो गया और ब्रह्मांडीय संतुलन बना रहा।
आध्यात्मिक अर्थ
अपस्मार को अज्ञानता, अहंकार और विस्मृति का प्रतीक माना जाता है। नटराज का तांडव दर्शाता है कि ज्ञान और चेतना की विजय संभव है।
इस कथा से यह भी संदेश मिलता है कि अज्ञानता को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता। इसे नियंत्रित रखना आवश्यक है, ताकि जीवन में संतुलन और विवेक बना रहे।