Lord Kalbhairav Jayanti 2025 : भय और अहंकार से मुक्ति का पर्व
India News Live,Digital Desk : हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान कालभैरव जयंती श्रद्धा और आस्था के साथ मनाई जाती है। वर्ष 2025 में यह पावन दिन 12 नवंबर, बुधवार को पड़ रहा है। इस दिन भक्तजन भगवान शिव के उग्र रूप कालभैरव की पूजा करते हैं।
कालभैरव अवतार की पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी के अहंकार से सृष्टि में असंतुलन उत्पन्न हुआ, तब भगवान शिव ने भैरव रूप धारण कर उस अहंकार का नाश किया। तभी से वे ‘कालभैरव’ कहलाए और उन्होंने काशी (वाराणसी) को अपना निवास स्थान बनाया।
शिवपुराण के काशी खंड में वर्णन मिलता है कि भगवान शिव ने काशी की रक्षा का दायित्व भैरव देव को सौंपा। तभी से उन्हें काशी का कोतवाल कहा जाने लगा।
काशी के कोतवाल की मान्यता
मान्यता है कि बिना भगवान कालभैरव की अनुमति के कोई भी व्यक्ति काशी में प्रवेश नहीं कर सकता।
वे धर्म की मर्यादा की रक्षा करते हैं और अधर्म करने वालों को स्वयं दंड देते हैं। इसीलिए वाराणसी आने वाले हर यात्री अपनी यात्रा की शुरुआत कालभैरव मंदिर दर्शन से करते हैं।
यह परंपरा केवल धार्मिक नियम नहीं, बल्कि यह दर्शाती है कि मोक्ष की नगरी में प्रवेश से पहले भय, पाप और अहंकार का त्याग आवश्यक है।
कालभैरव पूजा की परंपरा
काशी में यह मान्यता है कि बिना कालभैरव दर्शन के तीर्थ यात्रा अधूरी मानी जाती है। श्रद्धालु पहले कालभैरव मंदिर में जाकर नगर के कोतवाल को प्रणाम करते हैं, उसके बाद ही विश्वनाथ, अन्नपूर्णा देवी और अन्य देवताओं के दर्शन करते हैं।
माना जाता है कि कालभैरव की अनुमति प्राप्त करने के बाद ही भक्त को पूर्ण पुण्य फल मिलता है।
कालभैरव मंदिर का महत्व
काशी का कालभैरव मंदिर शिवभक्तों के लिए अत्यंत पवित्र स्थान है।
यह मंदिर भगवान शिव के आठ प्रमुख भैरव रूपों में से सर्वश्रेष्ठ कालभैरव को समर्पित है। कहा जाता है कि यहां की मूर्ति स्वयंभू है और काल तथा मृत्यु पर नियंत्रण रखने वाले भैरव देव की प्रत्यक्ष उपस्थिति का प्रतीक है।
भक्ति, निर्भयता और मुक्ति का संगम
भक्तों का विश्वास है कि सच्चे मन से की गई कालभैरव उपासना से व्यक्ति के जीवन से भय, पाप और नकारात्मकता का नाश होता है। यह मंदिर केवल पूजा का स्थल नहीं, बल्कि भक्ति, निर्भयता और मुक्ति का संगम है — जहां भक्त अपने भीतर के अहंकार और भय को त्यागकर आत्मिक शांति प्राप्त करता है।