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May 02 2026 10:18 pm

सुप्रीम कोर्ट में 'न्याय' की लंबी वेटिंग लिस्ट: 3500 से ज्यादा जनहित याचिकाएं अटकीं, कानून मंत्रालय की रिपोर्ट ने उड़ाई नींद...

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India News Live,Digital Desk : देश की सबसे बड़ी अदालत, यानी सुप्रीम कोर्ट में जनहित के मुद्दों पर सुनवाई की रफ्तार को लेकर एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है। कानून मंत्रालय द्वारा जारी ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट में वर्तमान में 3500 से भी अधिक जनहित याचिकाएं (PIL) लंबित हैं। यह आंकड़ा न केवल न्यायपालिका पर बढ़ते बोझ को दर्शाता है, बल्कि आम आदमी की उन उम्मीदों पर भी सवालिया निशान लगाता है जो 'लोकहित' के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं।

फाइलों के बोझ तले दबी जनहित की आवाज

कानून मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, लंबित जनहित याचिकाओं की यह संख्या पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है। इनमें से कई याचिकाएं सालों से लंबित हैं, जो पर्यावरण, भ्रष्टाचार, मानवाधिकार और सामाजिक सुधार जैसे गंभीर विषयों से जुड़ी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि याचिकाओं की बढ़ती संख्या और जजों की सीमित संख्या के बीच का असंतुलन इस देरी का मुख्य कारण है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट समय-समय पर फालतू याचिकाओं पर जुर्माना भी लगाता है, लेकिन वास्तविक मुद्दों वाली पीआईएल भी तारीखों के भंवर में फंसी हुई हैं।

कानून मंत्रालय की रिपोर्ट में और क्या है खास?

मंत्रालय ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि अदालतों में मुकदमों के निपटारे के लिए सरकार बुनियादी ढांचे और तकनीक पर जोर दे रही है। रिपोर्ट में यह भी संकेत दिया गया है कि निचली अदालतों से लेकर शीर्ष अदालत तक, पेंडेंसी कम करना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। 3500+ का यह आंकड़ा केवल सुप्रीम कोर्ट का है, जबकि अगर राज्यों के हाई कोर्ट की बात की जाए, तो यह संख्या कई गुना ज्यादा हो सकती है। आम नागरिकों के लिए यह स्थिति चिंताजनक है क्योंकि पीआईएल को न्याय तक पहुंच का सबसे आसान जरिया माना जाता है।

देरी से न्याय मिलने का क्या होगा असर?

कानूनी जानकारों का कहना है कि जब जनहित के मुद्दों पर फैसला आने में सालों लग जाते हैं, तो उस याचिका का मूल उद्देश्य ही खत्म होने लगता है। उदाहरण के तौर पर, अगर किसी प्रदूषण से संबंधित मुद्दे पर 5 साल बाद सुनवाई होती है, तब तक पर्यावरण को अपूरणीय क्षति हो चुकी होती है। सरकार अब डिजिटल कोर्ट और ई-फाइलिंग के जरिए इस बोझ को कम करने की कोशिश कर रही है, लेकिन 3500 से अधिक लंबित मामले बताते हैं कि अभी मंजिल काफी दूर है।