Islamization of Maldives एक सूफ़ी संत ने कैसे बदली पूरे देश की पहचान? 896 साल पूरे
India News Live,Digital Desk :कल्पना कीजिए नौ शताब्दियों से भी पहले के मालदीव की, जब वहाँ आज जैसा इस्लाम नहीं था। कहानियाँ बताती हैं कि लोग बुतपरस्ती में विश्वास रखते थे और कभी-कभी 'रण्णामारी' जैसे समुद्री राक्षसों से भी डरे रहते थे। फिर एक दिन, एक ऐसा ऐतिहासिक मोड़ आया जिसने पूरे देश की किस्मत ही बदल दी।
आज यानी रबी उल अव्वल 2 को मालदीव में एक ख़ास दिन के तौर पर मनाया जाता है - 896 साल पहले, आज ही के दिन, यानी इस्लामिक कैलेंडर के 548 हिजरी (जो ईसाई कैलेंडर के अनुसार 1153 ईस्वी है) में मालदीव आधिकारिक तौर पर इस्लाम में परिवर्तित हो गया था। यह सिर्फ एक धर्म बदलने की घटना नहीं थी, बल्कि इसने पूरे मालदीव की संस्कृति, समाज और पहचान को हमेशा के लिए बदल दिया।
इस महान परिवर्तन का श्रेय मोरक्को के एक सूफ़ी संत और विद्वान अबू अल-बरकत युसुफ़ अल-बरबरी को जाता है। माना जाता है कि उनकी प्रेरणा से ही तब के राजा धवेमी कालमिंझा ने इस्लाम धर्म अपनाया। राजा का नाम बदल कर सुल्तान मुहम्मद बिन अब्दुल्ला हो गया, और उनके धर्मांतरण के साथ ही पूरे देश ने इस्लाम को अपना लिया। यह पल इतना निर्णायक था कि इसे आज भी राष्ट्रीय दिवस के रूप में याद किया जाता है।
इस्लाम ने मालदीव को क्या दिया?
पर्यटकों के स्वर्ग माने जाने वाले मालदीव में आज भी आपको हर तरफ इस्लामिक वास्तुकला, स्थानीय भाषा दिवेही में अरबी शब्दों का प्रभाव और मस्जिदों की भव्यता दिखाई देगी। प्रसिद्ध यात्री इब्न बतूता के यात्रा-वृत्तांतों में भी इस ऐतिहासिक परिवर्तन का जिक्र मिलता है।
कुल मिलाकर, 12वीं सदी में हुए इस इस्लामीकरण ने मालदीव को न केवल एक नया धर्म दिया, बल्कि उसे एक सशक्त राष्ट्रीय पहचान, समृद्ध संस्कृति और एकीकृत समाज भी प्रदान किया, जो आज भी वहाँ के लोगों के जीवन का आधार है।