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September 26 2026 01:42 am

IIT बॉम्बे सुसाइड केस: 'साहिल ने 4 महीने में नहीं की कोई शिकायत', SC/ST सेल और फैकल्टी फोरम का बड़ा खुलासा

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देश के प्रतिष्ठित प्रौद्योगिकी संस्थान भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) बॉम्बे के पवई स्थित कैंपस में बीटेक द्वितीय वर्ष के छात्र साहिल रवींद्र वाकोडे की दुखद आत्महत्या के मामले में एक बड़ा और महत्वपूर्ण प्रशासनिक खुलासा हुआ है। छात्र की मौत के बाद कैंपस में उपजे तनाव, छात्रों के विरोध-प्रदर्शनों और इनविजिलेटर प्रोफेसर सूर्यनारायण डूला पर लगाए जा रहे आरोपों के बीच आईआईटी बॉम्बे फैकल्टी फोरम खुलकर प्रोफेसर के बचाव में सामने आ गया है। फैकल्टी फोरम के अध्यक्ष प्रोफेसर राजकुमार पंत ने आधिकारिक दस्तावेजों और आंतरिक रिकॉर्ड्स का हवाला देते हुए प्रोफेसर डूला पर लगाए गए पक्षपात और जातिगत उत्पीड़न के सभी दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। फोरम ने स्पष्ट किया कि संस्थान के आधिकारिक एससी/एसटी सेल के पास ऐसा कोई साक्ष्य या लिखित आवेदन मौजूद नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि छात्र ने अपनी मौत से पहले के महीनों में किसी भी प्रकार के उत्पीड़न, भेदभाव या शिकायत को लेकर कभी प्रशासन से संपर्क किया था।

एससी/एसटी सेल के आधिकारिक रिकॉर्ड से खुलासा: पिछले चार महीनों में नहीं मिली कोई शिकायत

आईआईटी बॉम्बे फैकल्टी फोरम के अध्यक्ष प्रोफेसर राजकुमार पंत ने संस्थान के आंतरिक सेल की आधिकारिक रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि छात्र की असामयिक मृत्यु के तुरंत बाद एससी/एसटी सेल ने अपने सभी अभिलेखों और लॉग्स की गहन समीक्षा की थी। इसके बाद जारी आधिकारिक आंतरिक नोटिस में यह पूरी तरह स्पष्ट किया गया कि साहिल वाकोडे ने पिछले तीन से चार महीनों के दौरान किसी भी मुद्दे को लेकर एससी/एसटी सेल से संपर्क करने की कोई भी कोशिश नहीं की थी। प्रोफेसर पंत ने कहा कि औपचारिक शिकायत दर्ज कराना तो बहुत दूर की बात है, छात्र ने अनौपचारिक रूप से भी किसी समस्या, मानसिक तनाव या भेदभाव की बात सेल के किसी अधिकारी या प्रतिनिधि के समक्ष कभी नहीं रखी थी। इस तथ्य के सामने आने से यह साफ होता है कि संस्थान की स्थापित शिकायत निवारण प्रणाली के समक्ष इस प्रकार की कोई पूर्व शिकायत कभी लंबित नहीं थी।

प्रोफेसर डूला ने नहीं तोड़ा कोई नियम: शैक्षणिक मर्यादा और नियमों के तहत हुई थी कार्रवाई

प्रोफेसर सूर्यनारायण डूला पर लगे आरोपों का बिंदुवार खंडन करते हुए प्रोफेसर राजकुमार पंत ने कहा कि एक शिक्षक के रूप में वे सभी संस्थान की निर्धारित नियमावली और आचार संहिता से बंधे हुए हैं। जब कोई शिक्षक परीक्षा कक्ष के भीतर इनविजिलेटर के रूप में तैनात होता है, तो उसका प्रमुख दायित्व संस्थान द्वारा तय किए गए कर्तव्यों का अक्षरशः पालन करना और परीक्षा की शुचिता को बनाए रखना होता है। प्रोफेसर पंत ने बल देकर कहा कि परीक्षा कक्ष में कथित तौर पर अनधिकृत स्मार्टफोन और नकल सामग्री पाए जाने पर प्रोफेसर डूला ने केवल वही कदम उठाया जो संस्थान के प्रोटोकॉल के तहत अनिवार्य था। उन्होंने किसी भी व्यक्तिगत दुर्भावना या मनमाने तरीके से कोई कार्रवाई नहीं की, बल्कि नियम पुस्तिका के आधार पर छात्र को कक्ष से बाहर जाने का निर्देश दिया था।

स्टूडेंट अफेयर्स के डीन रह चुके हैं प्रोफेसर डूला: छात्र-हितैषी छवि पर सवाल उठाना गलत

प्रोफेसर डूला के पिछले प्रशासनिक ट्रैक रिकॉर्ड और उनके स्वभाव का उल्लेख करते हुए फैकल्टी फोरम के अध्यक्ष ने कहा कि मौजूदा समय में एकेडमिक अफेयर्स के डीन का पद संभालने से पहले प्रोफेसर डूला वर्षों तक स्टूडेंट अफेयर्स के डीन के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। अपने उस कार्यकाल के दौरान वे छात्रों की समस्याओं के त्वरित समाधान, उनकी व्यक्तिगत काउंसलिंग और हर संभव मदद के लिए पूरे कैंपस में पहचाने जाते थे। प्रोफेसर पंत ने कहा कि जो शिक्षक हमेशा छात्रों के कल्याण और उनके अधिकारों के संरक्षण के लिए तत्पर रहा हो, उसके ऊपर अचानक जातिगत दुर्भावना या छात्र को प्रताड़ित करने का आरोप लगाना अत्यंत अनुचित और दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने जोर दिया कि कभी-कभी शैक्षणिक अनुशासन सुनिश्चित करने के लिए संकाय सदस्यों को नियमों के तहत सख्त निर्णय लेने पड़ते हैं, और इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं निकाला जाना चाहिए कि शिक्षक किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त था।

कैंपस में जारी विरोध-प्रदर्शन के बीच फैकल्टी समुदाय की एकजुटता: निष्पक्ष जांच की मांग

साहिल वाकोडे की मृत्यु के बाद आईआईटी बॉम्बे के कुछ छात्र संगठनों और सामाजिक समूहों द्वारा कैंपस में किए जा रहे विरोध-प्रदर्शनों के बीच शिक्षकों का यह आधिकारिक बयान बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। प्रदर्शनकारी जहां प्रोफेसर डूला के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं, वहीं फैकल्टी फोरम ने निष्पक्षता और तथ्यों के आधार पर न्याय की अपील की है। फैकल्टी सदस्यों का कहना है कि जांच एजेंसियों को भावनात्मक दबाव या एकतरफा बयानों के बजाय सीसीटीवी फुटेज, आधिकारिक रिकॉर्ड्स और प्रत्यक्षदर्शियों के साक्ष्यों के आधार पर जांच आगे बढ़ानी चाहिए। इस मामले में मुंबई पुलिस और क्राइम ब्रांच की टीमें पहले से ही घटना के दिन की पूरी टाइमलाइन की जांच कर रही हैं, और फैकल्टी फोरम के इस रुख ने अब मामले को एक नए कानूनी और प्रशासनिक दृष्टिकोण पर लाकर खड़ा कर दिया है।