महाशक्ति से लाचारी तक: 1962 में दुनिया को थर्राने वाला क्यूबा आज अस्तित्व की लड़ाई क्यों लड़ रहा है?

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India News Live,Digital Desk : अमेरिका से महज 90 मील दूर स्थित क्यूबा, जिसने कभी सोवियत संघ के साथ मिलकर पूरी दुनिया को परमाणु युद्ध के मुहाने पर खड़ा कर दिया था, आज अपने सबसे काले दौर से गुजर रहा है। जिस देश की धमक से कभी अमेरिका भी कांपता था, आज वही देश संयुक्त राष्ट्र (UN) के दरवाजे पर खड़ा होकर मदद की गुहार लगा रहा है। क्यूबा के इस पतन की कहानी किसी फिल्म की पटकथा जैसी है, जिसमें साम्यवाद का उत्थान, मिसाइल संकट का दबदबा और फिर धीरे-धीरे आर्थिक व रणनीतिक पतन शामिल है।

जब दुनिया क्यूबा के नाम से कांपती थी

इतिहास के पन्नों को पलटें तो 1959 की क्रांति के बाद फिदेल कास्त्रो और चे गेवेरा ने अमेरिका समर्थित बतिस्ता तानाशाही को उखाड़ फेंका था। 1962 का 'क्यूबा मिसाइल संकट' इस देश के इतिहास का सबसे निर्णायक मोड़ था। सोवियत संघ द्वारा क्यूबा में परमाणु मिसाइलें तैनात किए जाने के बाद, क्यूबा एक वैश्विक महाशक्ति की तरह उभरकर सामने आया। उस समय क्यूबा ने अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में सैन्य आंदोलनों को हवा दी और वैश्विक राजनीति में अपना दबदबा बनाया।

पतन की शुरुआत: कैसे 'स्पेशल पीरियड' ने सब बदल दिया?

क्यूबा के पतन की शुरुआत वैचारिक और आर्थिक दोनों स्तरों पर हुई:

वैचारिक झटका: चे गेवेरा की हत्या ने क्यूबा की क्रांतिकारी लहर को बड़ा झटका दिया।

सोवियत संघ का विघटन: क्यूबा की अर्थव्यवस्था पूरी तरह सोवियत वित्तीय मदद और सस्ते तेल पर टिकी थी। 1991 में सोवियत संघ के टूटने के साथ ही क्यूबा का सहारा छिन गया।

'स्पेशल पीरियड': 1991 के बाद का दौर 'स्पेशल पीरियड' कहलाया, जिसमें ईंधन की भयंकर कमी, सामाजिक अशांति और देश छोड़कर भागने का सिलसिला शुरू हुआ।

ट्रंप की धमकियां और 30 साल पुरानी कड़वाहट

आज की बदहाली की एक बड़ी वजह अमेरिका के साथ जारी तनाव है। 1996 में क्यूबा द्वारा अमेरिकी विमानों को मार गिराए जाने की घटना का बदला अब डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ले रहा है। ट्रंप ने पूर्व राष्ट्रपति राउल कास्त्रो के खिलाफ अदालती वारंट जारी किया है और वेनेजुएला के बाद क्यूबा को अपना 'अगला सैन्य टारगेट' तक बता दिया है। वेनेजुएला से तेल आपूर्ति बंद होने के कारण क्यूबा का पावर ग्रिड ठप हो चुका है, जिससे अस्पताल से लेकर फैक्ट्रियों तक सब जनरेटर पर निर्भर हैं।

संयुक्त राष्ट्र से आखिरी उम्मीद

अब क्यूबा के विदेश मंत्री ब्रूनो रोड्रिग्ज पारिला ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में गुहार लगाई है। मानवीय त्रासदी को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मदद की अपील करते हुए क्यूबा ने दुनिया के सामने अपनी लाचारी जाहिर की है। आज क्यूबा के पास न तो वह सैन्य ताकत है जो 1962 में थी और न ही वे आर्थिक संसाधन जो उसे संभाल सकें। सवाल यह है कि क्या दुनिया इस कम्युनिस्ट देश को इस मानवीय संकट से उबारने के लिए आगे आएगी, या क्यूबा का अस्तित्व इतिहास के पन्नों में दब जाएगा?