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November 05 2026 09:42 pm

1965 भारत-पाक युद्ध के अमर सेनानी फ्लाइट लेफ्टिनेंट एटी कुक का 87 वर्ष की उम्र में निधन

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भारतीय सैन्य इतिहास के स्वर्णिम अध्यायों में अपना नाम दर्ज कराने वाले भारतीय वायुसेना के जांबाज योद्धा और वीर चक्र से अलंकृत पूर्व फ्लाइट लेफ्टिनेंट अल्फ्रेड टाइरोन कुक (एटी कुक) का शुक्रवार को राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में निधन हो गया। वे 87 वर्ष के थे और उम्र संबंधी स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे थे। भारतीय वायुसेना (IAF) ने शनिवार को आधिकारिक बयान जारी कर इस महान एयर वॉरियर के निधन की पुष्टि की और पूरे सैन्य सम्मान के साथ उन्हें भावभीनी विदाई दी। उनके जाने से भारतीय रक्षा तंत्र और सैन्य इतिहास प्रेमियों में शोक की लहर दौड़ गई है।

भारतीय वायुसेना ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपने विशेष श्रद्धांजलि संदेश में कहा कि फ्लाइट लेफ्टिनेंट कुक का युद्ध कौशल, अदम्य साहस और कर्तव्य के प्रति समर्पण भारतीय वायु योद्धाओं की आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव एक अमर प्रेरणा बना रहेगा। वायुसेना ने कहा कि बंगाल के आसमान में कालाइकुंडा के ऊपर लड़ी गई उनकी हवाई मुठभेड़ आधुनिक सामरिक युद्धकला, सटीक निशानेबाजी और आत्म-बलिदान की भावना का अद्वितीय उदाहरण है। कुक ने अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा को पूरी तरह भुलाकर देश के रणनीतिक एयरबेस की रक्षा की थी।

7 सितंबर 1965 का वो खूनी सवेरा: कालाइकुंडा एयरबेस पर पाक वायुसेना का अचानक हमला

भारत-पाक 1965 के युद्ध के दौरान पूर्वी मोर्चे पर हुई वह घटना आज भी सैन्य अकादमियों में एक मिसाल के तौर पर पढ़ाई जाती है। सात सितंबर 1965 की सुबह पाकिस्तान वायुसेना ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत पश्चिम बंगाल के खड़गपुर स्थित कालाइकुंडा एयर फोर्स स्टेशन पर ताबड़तोड़ हवाई हमला बोल दिया था। दुश्मन के इस अचानक हुए शुरुआती हमले में रनवे और जमीन पर खड़े कई भारतीय विमान क्षतिग्रस्त हो गए थे। एयरबेस को पूरी तरह तबाह करने और आसमान पर अपना दबदबा कायम करने के लिए पाकिस्तानी वायुसेना ने तुरंत बाद अत्याधुनिक अमेरिकी निर्मित एफ-86 सेबर लड़ाकू विमानों (F-86 Sabre) की एक और आक्रामक टुकड़ी को कालाइकुंडा के आकाश में झोंक दिया।

उस संकट की घड़ी में भारतीय वायुसेना की 14वीं स्क्वाड्रन, जिसे 'द बुल्स' (The Bulls) के नाम से ख्याति प्राप्त थी, तत्काल हरकत में आई। स्क्वाड्रन के तत्कालीन फ्लाइट लेफ्टिनेंट अल्फ्रेड टाइरोन कुक और उनके साथी फ्लाइंग ऑफिसर सुबोध चंद्र मामगेन अपने हॉकर हंटर (Hawker Hunter) लड़ाकू विमानों के साथ आसमान में पहले से ही कॉम्बैट एयर पेट्रोलिंग (CAP) गश्त पर थे। दुश्मन के इरादों को भांपते हुए इन दोनों पायलटों ने बिना किसी हिचकिचाहट के हमलावर पाकिस्तानी सेबर जेट्स को बीच रास्ते में ही इंटरसेप्ट करने और उन्हें खदेड़ने के लिए अपने विमानों का रुख मोड़ दिया।

अकेले चार पाकिस्तानी लड़ाकू जेट्स से भिड़ंत, डॉगफाइट में एक सेबर को मार गिराया, दो को किया तबाह

आसमान में दाखिल होते ही जंग की तस्वीर बेहद चुनौतीपूर्ण हो गई जब अचानक परिस्थितियों के चलते फ्लाइट लेफ्टिनेंट कुक का अपने साथी से संपर्क बाधित हुआ और वे अकेले ही चार पाकिस्तानी एफ-86 सेबर जेट्स के चक्रव्यूह में घिर गए। संख्या बल और तकनीकी दृष्टि से दुश्मन उन पर कई गुना भारी था, लेकिन कुक ने पीछे हटने के बजाय सामने से हमला बोलने का फैसला किया। जमीन से महज कुछ सौ फीट की ऊंचाई पर यानी लो-एल्टीट्यूड डॉगफाइट के दौरान कुक ने अपने हंटर विमान को अभूतपूर्व फुर्ती के साथ मोड़ा और एक-एक करके दुश्मन के विमानों को अपनी गन-साइट में लेना शुरू कर दिया।

अत्यधिक गति और तनाव के बीच कुक ने अपनी 30 एमएम की बंदूकों से लगातार सटीक गोलियां बरसाईं। उपलब्ध गन-कैमरा फुटेज और आधिकारिक युद्ध रिकॉर्ड के अनुसार, फ्लाइट लेफ्टिनेंट कुक ने आमने-सामने की इस भीषण लड़ाई में एक पाकिस्तानी सेबर जेट को हवा में ही आग का गोला बनाकर सीधे जमीन पर गिरा दिया। इसके साथ ही उन्होंने अपनी तेज पैंतरेबाजी से दो अन्य पाकिस्तानी विमानों को इतनी बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया कि उनके पायलटों को उल्टे पांव अपनी सीमा की ओर भागने पर मजबूर होना पड़ा। अकेले एक भारतीय लड़ाकू विमान के इस रौद्र रूप ने पाकिस्तानी वायुसेना के मंसूबों को पूरी तरह चकनाचूर कर दिया और कालाइकुंडा एयरबेस को एक बड़ी तबाही से बचा लिया।

वीरता के लिए मिला वीर चक्र, भारतीय वायुसेना के इतिहास में अमर हुई 'बुल्स' स्क्वाड्रन की गाथा

इस हैरतअंगेज हवाई लड़ाई के बाद भारत सरकार ने अल्फ्रेड टाइरोन कुक को उनके अद्वितीय पराक्रम, असाधारण सामरिक सोच और दुश्मन के छक्के छुड़ाने वाले शौर्य के लिए देश के तीसरे सर्वोच्च वीरता पुरस्कार 'वीर चक्र' से सम्मानित किया। उनके इस साहसिक कारनामे ने 1965 के युद्ध में भारतीय वायुसेना के मनोबल को असीम ऊंचाइयों तक पहुंचाया था। उनकी इस ऐतिहासिक मुठभेड़ ने दुनिया को यह दिखा दिया था कि विमान की तकनीक से ज्यादा अहम उस कॉकपिट में बैठे पायलट का कलेजा और उसका दृढ़ संकल्प होता है।

कुक के निधन पर सैन्य अधिकारियों, पूर्व सैनिकों और रक्षा विशेषज्ञों ने गहरा शोक प्रकट करते हुए कहा कि भारत ने अपने आकाश का एक सच्चा पहरेदार खो दिया है। वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा कि फ्लाइट लेफ्टिनेंट एटी कुक की वह जांबाजी हमेशा याद दिलाई जाएगी कि कैसे एक अकेला भारतीय शेर चार-चार बाजुओं को चीरते हुए तिरंगे का मान बचाकर सुरक्षित लौटा था। उनका जीवन और कालाइकुंडा की वह ऐतिहासिक डॉगफाइट हमेशा भारत के रक्षा इतिहास के सुनहरे पन्नों पर अंकित रहेगी।