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September 28 2026 09:20 pm

'पहिले पहिल छठी मैया' गीत के हर एक शब्द में छिपा है गहरा भाव, जानें क्यों इसके बिना अधूरा माना जाता है छठ महापर्व

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लोक आस्था और सूर्य उपासना के महापर्व छठ की कल्पना पारंपरिक भोजपुरी गीतों के बिना अधूरी मानी जाती है। जब भी कार्तिक महीने में नदी और तालाबों के घाटों पर लाल-पीले परिधानों में सजी व्रती महिलाएं सूप और दउरा लेकर पहुंचती हैं, तो फिजाओं में गूंजने वाला सबसे पहला और भावुक गीत होता है—'पहिले पहिल हम कईनी, छठी मईया व्रत तोहार'। पद्म भूषण से सम्मानित स्वर कोकिला शारदा सिन्हा की सुरीली और आत्मीय आवाज में गाया यह गीत सिर्फ एक भजन नहीं, बल्कि बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के करोड़ों लोगों की आस्था की धड़कन है। कई लोग इस गीत को सुनते ही भावुक हो जाते हैं, लेकिन इसके बोल के पीछे का गहरा आध्यात्मिक और पारिवारिक अर्थ इसे और भी खास बना देता है।

पहली बार व्रत उठाने का संकोच और छठी मैया से क्षमा-याचना

गीत की शुरुआती पंक्तियां हैं—'पहिले पहिल हम कईनी, छठी मईया व्रत तोहार। करिहा क्षमा छठी मईया, भूल-चूक गलती हमार।' इन पंक्तियों का शाब्दिक और भावार्थ एक नई व्रती के हृदय की निर्मल भावना को दर्शाता है। छठ का 36 घंटे का निर्जला व्रत बेहद कठोर, अनुशासित और शुद्धता से जुड़ा होता है। जब कोई महिला जीवन में पहली बार इस कठिन व्रत की शुरुआत करती है, तो उसके मन में निष्ठा के साथ-साथ एक डर भी होता है कि कहीं अनजाने में उससे पूजा या नियमों में कोई त्रुटि न हो जाए। इसलिए वह मां छठी से प्रार्थना करती है कि हे छठी मईया, मैंने पहली बार आपकी कठिन उपासना का संकल्प लिया है, यदि मेरी इस पूजा में जाने-अनजाने कोई भूल या गलती हो जाए, तो एक मां की तरह मुझे क्षमा कर देना।

संतान का दुलार, पति का अटूट प्रेम और परिवार की सुख-समृद्धि

गीत के अगले अंतरे में पारिवारिक जीवन के सुख और सुरक्षा की मार्मिक कामना की गई है—'गोदी के बलकवा के दिहा, छठी मईया ममता-दुलार। पिया के सनईहा बनईहा, मईया दिहा सुख-सार।' यह पंक्ति छठ पर्व के मूल उद्देश्य को उजागर करती है। व्रती मां अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए प्रार्थना करती है कि हे मैया, मेरी गोद में जो बालक खेल रहा है, उस पर हमेशा अपनी ममता और दुलार बनाए रखना। इसके साथ ही, वह अपने सुहाग यानी पति के साथ अटूट प्रेम, जीवनसाथी के स्नेह और पूरे घर में सुख, शांति व संपन्नता (सुख-सार) की स्थिरता का वरदान मांगती है। यह गीत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि गृहस्थ जीवन को एकजुट रखने की प्रार्थना बन जाता है।

सजे हुए नदी घाट, नारियल-केले का अर्घ्य और कुल-परिवार की वृद्धि

गीत का तीसरा और चौथा छंद छठ पूजा के मनोरम दृश्य और अर्घ्य की महत्ता को सामने लाता है—'नारियल-केरवा घोउदवा, साजल नदिया किनार। सुनिहा अरज छठी मईया, बढ़े कुल-परिवार।' और 'घाट सजेवली मनोहर, मईया तोरा भगती अपार। लिहिएं अरग हे मईया, दिहीं आशीष हजार।' इसमें नदी के किनारे सजाए गए पवित्र घाट, बांस के सूप, दउरा, कच्चे नारियल और केले के बड़े-बड़े घौद (गुच्छों) का वर्णन है। भक्त कहती है कि हे मैया, आपके प्रति मेरी अपार और निस्वार्थ भक्ति है, इसलिए मैंने नदी तट को पूरी श्रद्धा से सजाया है। आप हमारी इस विनम्र विनती को स्वीकार करें, हमारे वंश और कुल-परिवार को आगे बढ़ाएं। जब डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाए, तो हे मैया, आप इसे स्वीकार कर अपनी संतानों को हजारों-हजार आशीर्वाद प्रदान करें।

शारदा सिन्हा की आवाज और छठ पर्व का अमर रिश्ता

बिहार और पूर्वांचल के समाज में इस गीत की लोकप्रियता का आलम यह है कि भले ही कोई व्यक्ति देश या दुनिया के किसी भी कोने में रह रहा हो, यह धुन बजते ही उसे अपने गांव का छठ घाट, मां का आंचल और मिट्टी की खुशबू याद आ जाती है। यह गीत आधुनिकता के दौर में भी अपनी जड़ों से जुड़े रहने का सबसे मजबूत माध्यम है। छठ महापर्व के दौरान जब तक यह गीत न बजे, तब तक पूजा का माहौल संपूर्ण नहीं लगता। यह गीत एक व्रती के दिल की बात को ईश्वर तक पहुंचाने का सबसे सरल, विनम्र और आत्मिक जरिया माना जाता है।