Electricity privatization vs debt burden : विरोधाभासी नीतियों पर उपभोक्ता परिषद ने उठाए सवाल
India News Live, Digital Desk: राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन की हालिया गतिविधियों पर गंभीर चिंता जताई है। परिषद का कहना है कि एक ओर सरकार बिजली वितरण कंपनियों को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी कर रही है, वहीं दूसरी ओर पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन बैंकों से भारी-भरकम कर्ज ले रहा है। हाल ही में निदेशक मंडल ने 2000 करोड़ रुपये पीएफसी से और 400 करोड़ रुपये इंडियन ओवरसीज बैंक से कर्ज लेने का प्रस्ताव पास किया है।
परिषद के अध्यक्ष अवधेश वर्मा ने कहा कि यह दोनों निर्णय परस्पर विरोधाभासी हैं। एक तरफ बिजली कंपनियों को बेचना, और दूसरी तरफ उनके संचालन के लिए कर्ज लेना – यह नीति समझ से परे है।
उन्होंने जानकारी दी कि राज्य में करीब 3.45 करोड़ बिजली उपभोक्ता हैं, जिनमें से लगभग 1.70 करोड़ उपभोक्ताओं वाले पूर्वांचल और दक्षिणांचल वितरण निगमों को निजी हाथों में सौंपने की प्रक्रिया चल रही है।
सवाल यह उठता है कि जब सरकार कह रही है कि अब वह बिजली कंपनियों के घाटे को नहीं उठाएगी, तो फिर भारी कर्ज लेकर उस घाटे को और क्यों बढ़ाया जा रहा है?
सरकार हर साल बिजली सब्सिडी के नाम पर करीब 16,500 करोड़ रुपये देती है, जबकि बिजली उपभोक्ता हर साल 3,000 से 4,000 करोड़ रुपये बिजली शुल्क के रूप में सरकार को दे रहे हैं। ऐसे में घाटे की जिम्मेदारी उपभोक्ताओं पर डालना उचित नहीं है।
22 जून को लखनऊ में महापंचायत का ऐलान
बिजली के निजीकरण के खिलाफ अब विरोध तेज होने वाला है। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने 22 जून को लखनऊ में एक महापंचायत आयोजित करने का निर्णय लिया है। इसमें बिजली उपभोक्ताओं, किसानों और कर्मचारियों को शामिल किया जाएगा।
इस महापंचायत में बड़े आंदोलन की रूपरेखा बनाई जाएगी और पावर कॉरपोरेशन द्वारा दिए जा रहे निजीकरण के आंकड़ों की वास्तविकता को उजागर करते हुए एक श्वेत पत्र जारी किया जाएगा।
संघर्ष समिति का उद्देश्य यह है कि ओडिशा, दिल्ली, चंडीगढ़, आगरा और ग्रेटर नोएडा जैसे शहरों में निजीकरण के बाद उपभोक्ताओं को हुई परेशानियों और कर्मचारियों की दुर्दशा से प्रदेश सरकार को अवगत कराया जाए।
22 जून के बाद प्रदेश के अन्य बड़े शहरों जैसे वाराणसी, आगरा और मेरठ में भी इसी तरह की महापंचायतें आयोजित की जाएंगी।