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September 30 2026 10:21 pm

केरल निकाय उपचुनाव में कांग्रेस को लगा बड़ा झटका: 3 सिटिंग सीटें गंवाईं, लेफ्ट गठबंधन ने मारी बाजी

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केरल की स्थानीय राजनीति में एक बार फिर बड़ा सियासी उलटफेर देखने को मिला है। राज्य के 12 जिलों के 38 स्थानीय निकाय (Local Body) वार्डों में हुए उपचुनाव के घोषित नतीजों ने कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) को गहरा झटका दिया है। हालांकि संख्याबल के लिहाज से यूडीएफ ने मामूली बढ़त बनाए रखी, लेकिन अपनी तीन मजबूत सिटिंग सीटें गंवाने के कारण यह मुकाबला सीधे तौर पर सत्तारूढ़ सीपीआई(एम) के नेतृत्व वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) के पक्ष में जाता दिखाई दिया। लेफ्ट गठबंधन ने आक्रामक अभियान के दम पर तीन अतिरिक्त वार्डों में जीत दर्ज कर कांग्रेस गठबंधन के गढ़ में सीधी सेंधमारी की है।

इस उपचुनाव को राज्य की आगामी बड़ी चुनावी लड़ाइयों से पहले जनता के मूड की नब्ज टटोलने वाले 'लिटमस टेस्ट' के तौर पर देखा जा रहा था। नतीजों के बाद कांग्रेस संगठन के भीतर चिंता की लकीरें खिंच गई हैं, जबकि लेफ्ट खेमे में इस प्रदर्शन से नया उत्साह देखने को मिल रहा है।

38 वार्डों के नतीजे: कांटे की टक्कर में यूडीएफ 19 और एलडीएफ 18 पर पहुंचा

राज्य चुनाव आयोग द्वारा जारी अंतिम नतीजों के मुताबिक, 38 वार्डों में मुख्य मुकाबला केवल दो पारंपरिक गठबंधनों—यूडीएफ और एलडीएफ के बीच ही सिमटा रहा:

यूडीएफ (UDF): 19 वार्डों में जीत हासिल की।

एलडीएफ (LDF): 18 वार्डों में परचम लहराया।

ट्वेंटी20 (Twenty20): 1 सीट पर जीत दर्ज की।

भाजपा / एनडीए (NDA): खाता भी नहीं खोल सका।

यदि पिछले चुनावों से तुलना की जाए, तो इन 38 वार्डों में पहले यूडीएफ का दबदबा ज्यादा मजबूत था। लेकिन इस बार कांग्रेस नीत गठबंधन को सीधे 3 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा, जिसे लेफ्ट गठबंधन ने अपने खाते में जोड़ लिया। महज एक सीट के अंतर से यूडीएफ भले ही तकनीकी रूप से सबसे आगे रहा, लेकिन अपनी ही जीती हुई सीटों पर हार का सामना करना पार्टी के लिए चिंताजनक माना जा रहा है।

लेफ्ट ने कांग्रेस के गढ़ में कैसे की सेंधमारी?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एलडीएफ ने स्थानीय स्तर पर बुनियादी ढांचे, जन कल्याणकारी योजनाओं और वार्ड स्तर के कार्यकर्ताओं की मजबूत माइक्रो-मैनेजमेंट रणनीति के सहारे कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाई। कई ग्रामीण और अर्ध-शहरी वार्डों में जहां कांग्रेस का कब्जा माना जाता था, वहां एलडीएफ के उम्मीदवारों ने बेहद करीबी अंतर से बाजी मारी।

कोच्चि और आसपास के कुछ संवेदनशील वार्डों में यूडीएफ अपनी पकड़ बचाने में जरूर कामयाब रहा, लेकिन दक्षिणी और मध्य केरल के कई पॉकेट्स में पार्टी के भीतर गुटबाजी और टिकट बंटवारे को लेकर उपजा असंतोष भारी पड़ा। इसके चलते मतदाताओं ने लेफ्ट के उम्मीदवारों को तरजीह दी।

भाजपा का सूपड़ा साफ, तीसरे विकल्प की तलाश अधूरी

इन उपचुनाव नतीजों का एक दूसरा अहम पहलू भारतीय जनता पार्टी (BJP) का प्रदर्शन रहा। केरल में लंबे समय से पांव पसारने की कोशिशों में जुटी भाजपा इस उपचुनाव में पूरी तरह खाली हाथ रही। 38 में से एक भी वार्ड में पार्टी का उम्मीदवार जीत दर्ज नहीं कर सका।

स्थानीय निकाय चुनावों के आंकड़े साफ संकेत दे रहे हैं कि केरल की जमीनी राजनीति अभी भी पूरी तरह द्विपक्षीय (Bipolar) है, जहां मुख्य जंग कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ और वाम दलों के एलडीएफ के इर्द-गिर्द ही घूमती है। एनडीए गठबंधन शहरी मतदाताओं के बीच भी अपनी पैठ को चुनावी जीत में बदलने में नाकाम रहा।

कांग्रेस के लिए आत्ममंथन का समय

इन उपचुनावों के परिणाम कांग्रेस नेतृत्व के लिए एक बड़ी चेतावनी माने जा रहे हैं। सीटों के नुकसान के अलावा कई वार्डों में पार्टी के वोट शेयर में आई गिरावट ने राज्य नेतृत्व को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है। खासकर पंचायत और ब्लॉक स्तर पर जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय की कमी और स्थानीय मुद्दों की अनदेखी को इस झटके का मुख्य कारण बताया जा रहा है।

अब कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि वह आगामी बड़े स्थानीय और विधानसभा चुनावों से पहले अपने कैडर को एकजुट करे और खोई हुई जमीन को दोबारा हासिल करने के लिए ठोस रोडमैप तैयार करे।