Bombay High Court's strong reply to CPM गाजा नहीं, पहले भारत के लोगों के मुद्दों पर दें ध्यान

Post

India News Live,Digital Desk : मुंबई की बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक अहम फ़ैसला सुनाते हुए सीपीआई-मार्क्सवादी (CPM) की उस याचिका को ख़ारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने गाजा पट्टी में चल रहे विवाद को लेकर एक विरोध प्रदर्शन रैली आयोजित करने की इजाजत मांगी थी। कोर्ट ने साफ़-साफ़ कह दिया कि भारतीय अदालतें अपने देश के नागरिकों और उनसे जुड़े क़ानूनों पर ध्यान केंद्रित करें, न कि अंतर्राष्ट्रीय भू-राजनीतिक मुद्दों पर।

न्यायमूर्ति एनजे जमादार की एकल पीठ ने याचिका ख़ारिज करते हुए टिप्पणी की, "अदालत के पास भारतीय लोगों के मुद्दों, भारत के लोगों के जीवन, उनके अधिकारों और उनसे संबंधित क़ानूनों पर काम करने का पर्याप्त समय और संसाधन हैं।" उनका इशारा इस बात पर था कि न्यायिक शक्ति का उपयोग हमारे अपने देश की समस्याओं को हल करने के लिए होना चाहिए।

कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि "फिलिस्तीन या गाजा में जो कुछ भी हो रहा है, वह भारत की विदेश नीति और भू-राजनीतिक मामलों का एक हिस्सा है, जिस पर इस अदालत में बहस नहीं की जा सकती।" सीधे शब्दों में कहें तो, विदेश नीति का निर्धारण सरकार का काम है, न कि अदालतों का। अदालतें इसमें दखल नहीं दे सकतीं।

सीपीआई-मार्क्सवादी की मुंबई समिति ने ठाणे शहर में इस विरोध प्रदर्शन को आयोजित करने की अनुमति मांगी थी, ताकि वे गाजा के हालात पर अपनी चिंता जता सकें। लेकिन, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया का उपयोग ऐसे मुद्दों पर बहस करने के लिए नहीं किया जा सकता जो सीधे तौर पर भारतीय नागरिकों के अधिकारों या क़ानूनों के दायरे में न आते हों।

यह फ़ैसला एक बार फिर से इस बात को रेखांकित करता है कि भारतीय अदालतें अपने देश के भीतर के मामलों, जैसे कि नागरिकों के अधिकार, न्यायपालिका की सीमाएं और आंतरिक क़ानून-व्यवस्था पर ज़्यादा फ़ोकस करती हैं। अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं पर भावनात्मक विरोध प्रदर्शन के लिए अदालत से अनुमति मांगना हमेशा जायज नहीं होता, ख़ासकर जब उनका सीधा संबंध देश के क़ानूनों या यहाँ के लोगों से न हो। कोर्ट के इस फ़ैसले से एक संदेश गया है कि अदालतों का बहुमूल्य समय और संसाधन भारत से जुड़े मामलों के लिए ही हैं।