आज केदारधाम पहुंचेगी बाबा की चल विग्रह डोली, कपाट खुलने से पहले कहां विश्राम करते हैं महादेव

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India News Live,Digital Desk : उत्तराखंड की ऊंची पहाड़ियों के बीच स्थित बाबा केदारनाथ के भक्तों के लिए आज का दिन बेहद खास है। भगवान शिव की चल विग्रह डोली आज अपने मुख्य धाम केदारनाथ पहुंच रही है। इसके साथ ही केदारपुरी के कपाट खुलने की घड़ी नजदीक आ गई है। मंदिर परिसर को 10 कुंतल फूलों से सजाया गया है और चारों ओर 'हर-हर महादेव' की गूंज सुनाई दे रही है।

क्या होती है 'चल विग्रह डोली'?

हिंदू परंपराओं के अनुसार, चल विग्रह डोली का अर्थ भगवान के उस विग्रह (मूर्ति) से है जिसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जा सकता है। चूंकि सर्दियों में भारी बर्फबारी के कारण केदारनाथ मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं, इसलिए बाबा केदार के इसी स्वरूप को पालकी में बिठाकर नीचे लाया जाता है। जब डोली वापस धाम पहुंचती है, तो इसका सीधा संकेत होता है कि अब बाबा अपने गृह क्षेत्र में विराजमान होने वाले हैं और यात्रा शुरू होने वाली है।

सर्दियों में कहां रहते हैं बाबा केदार?

दीपावली के बाद जब केदारनाथ धाम के कपाट शीतकाल के लिए बंद होते हैं, तब बाबा की चल विग्रह डोली को ऊखीमठ स्थित ओंकारेश्वर मंदिर ले जाया जाता है।

शीतकालीन प्रवास: पूरे छह महीने तक ऊखीमठ में ही बाबा केदार की नियमित पूजा-अर्चना की जाती है।

वापसी की यात्रा: गर्मी शुरू होते ही एक भव्य पदयात्रा के जरिए डोली को वापस केदारनाथ धाम लाया जाता है। इस दौरान हजारों श्रद्धालु पैदल चलकर डोली के साथ धाम तक पहुंचते हैं।

कपाट खुलने का शुभ मुहूर्त

इस वर्ष चारधाम यात्रा का आगाज होने ही वाला है। केदारनाथ और बद्रीनाथ धाम के कपाट खुलने की तिथियां तय हो चुकी हैं:

केदारनाथ धाम: बाबा केदार के कपाट कल यानी 22 अप्रैल 2026 की सुबह 8:00 बजे विधि-विधान के साथ खोले जाएंगे।

बद्रीनाथ धाम: भगवान बद्री विशाल के कपाट 23 अप्रैल 2026 को खुलेंगे।

मुख्यमंत्री की उपस्थिति में होने वाली पहली विशेष पूजा के साथ ही दर्शनार्थियों के लिए मंदिर खोल दिए जाएंगे।

बदली हुई केदारपुरी का दिव्य स्वरूप

2013 की भीषण आपदा के बाद केदारनाथ क्षेत्र का पुननिर्माण मास्टर प्लान के तहत किया गया है। अब केदारपुरी पहले से कहीं अधिक भव्य और व्यवस्थित नजर आती है। यात्रियों की सुविधाओं के लिए रास्ते चौड़े किए गए हैं और मंदिर के पास विशाल प्रांगण बनाया गया है। लिंचोली से आगे बर्फ से ढकी चोटियों का नजारा श्रद्धालुओं की सारी थकान मिटा देता है।