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October 04 2026 06:20 pm

आज का पंचांग 3 अक्टूबर 2026: अष्टमी श्राद्ध आज, जानें शुभ-अशुभ मुहूर्त, राहुकाल और तर्पण का सही समय

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सनातन पंचांग के अनुसार पितृपक्ष का प्रत्येक दिन हमारे पूर्वजों, पितरों और दिवंगतों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पावन अवसर होता है। आज 3 अक्टूबर 2026, दिन शनिवार है। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पितृपक्ष के अत्यंत महत्वपूर्ण दिनों में गिनी जाती है। शास्त्रों में अष्टमी तिथि के श्राद्ध को विशेष स्थान दिया गया है, जिसे मुख्य रूप से उन पूर्वजों के निमित्त किया जाता है जिनका देहावसान किसी भी महीने के कृष्ण या शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ हो। इसके साथ ही शनिवार का दिन होने के कारण कर्मफल दाता शनिदेव और भगवान हनुमान की पूजा-अर्चना का भी विशेष संयोग बन रहा है। किसी भी मांगलिक या धार्मिक कार्य, विशेषकर श्राद्ध कर्म, तर्पण और पिंडदान के लिए शुभ मुहूर्त, चौघड़िया और राहुकाल का ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है।

3 अक्टूबर 2026: तिथि, नक्षत्र, योग और करण का विवरण

वैदिक पंचांग की पांच प्रमुख शाखाओं—तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण का आज का विस्तृत विवरण इस प्रकार है:

संवत: विक्रम संवत 2083 (कालयुक्त)

शक संवत: 1948 (शोभकृत)

मास: आश्विन (कृष्ण पक्ष)

तिथि: अष्टमी तिथि (दिनभर प्रभावी)

वार: शनिवार

नक्षत्र: आद्रा नक्षत्र (इसके उपरांत पुनर्वसु नक्षत्र का संचरण)

योग: वरीयान योग (इसके उपरांत परिघ योग)

करण: बालव करण (तत्पश्चात कौलव करण)

सूर्य राशि: कन्या राशि

चंद्र राशि: मिथुन राशि

अष्टमी श्राद्ध का महत्व और तर्पण का विशेष विधान

पितृपक्ष में अष्टमी तिथि का श्राद्ध परिवार के पूर्वजों और दिवंगत आत्माओं की तृप्ति के लिए विशेष फलदायी माना गया है। जो जातक अपने पितरों के निमित्त श्रद्धापूर्वक जल, तिल, कुशा और अक्षत से तर्पण करते हैं, उन्हें पितृदोष से मुक्ति मिलती है और वंश वृद्धि तथा सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। शनिवार के दिन पड़ने वाली अष्टमी तिथि पर पीपल के वृक्ष के नीचे तिल के तेल या सरसों के तेल का दीपक प्रज्वलित करना अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, श्राद्ध कर्म कभी भी प्रातःकाल या सूर्यास्त के बाद नहीं करना चाहिए; इसके लिए दोपहर का समय, विशेषकर 'कुतुप' और 'रौहिण' मुहूर्त सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।

श्राद्ध कर्म और तर्पण के लिए आज के शुभ मुहूर्त

पितरों के तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोजन के लिए दिन का मध्य भाग निर्धारित है:

कुतुप मुहूर्त: दोपहर 11:45 से दोपहर 12:35 तक

रौहिण मुहूर्त: दोपहर 12:35 से दोपहर 01:25 तक

अपराह्न काल: दोपहर 01:25 से दोपहर 03:45 तक

इन मुहूर्तों में गाय, कौवे, कुत्ते और चींटियों के लिए पंचबलि भोग अवश्य निकालें। इसके उपरांत ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को सात्विक भोजन कराकर यथाशक्ति दान-दक्षिणा दें।

आज के सामान्य शुभ मुहूर्त: अभिजित और अमृत काल

दैनिक पूजा-पाठ, संकल्प और शुभ कार्यों के संपादन के लिए आज के ग्रह संयोग इस प्रकार हैं:

सूर्योदय: प्रातः 06:15 बजे

सूर्यास्त: सायं 06:05 बजे

चंद्रोदय: रात्रि 11:40 बजे

चंद्रास्त: दोपहर 12:50 बजे

अभिजित मुहूर्त: पूर्वाह्न 11:48 से दोपहर 12:36 तक (किसी भी महत्वपूर्ण कार्य की शुरुआत के लिए सर्वश्रेष्ठ)

विजय मुहूर्त: दोपहर 02:10 से दोपहर 02:58 तक

गोधूलि मुहूर्त: सायं 06:05 से सायं 06:30 तक

ब्रह्म मुहूर्त: प्रातः 04:38 से प्रातः 05:26 तक

आज का अशुभ काल: राहुकाल, यमगंड और गुलिक काल

किसी भी शुभ या मांगलिक कार्य, यात्रा या नए व्यापारिक सौदों में अशुभ मुहूर्तों का त्याग करना शास्त्रसम्मत है। शनिवार के दिन राहुकाल प्रातःकाल के बाद शुरू होता है:

राहुकाल: सुबह 09:15 से सुबह 10:45 तक (इस दौरान कोई भी नया कार्य आरंभ न करें और न ही कोई नया अनुबंध साइन करें)

यमगंड काल: दोपहर 01:45 से दोपहर 03:15 तक

गुलिक काल: प्रातः 06:15 से प्रातः 07:45 तक

दुर्मुहूर्त: प्रातः 06:15 से प्रातः 07:05 तक

दिशाशूल और यात्रा संबंधी आवश्यक नियम

शनिवार के दिन पूर्व दिशा में दिशाशूल रहता है। इसका अर्थ है कि आज पूर्व दिशा की ओर लंबी यात्रा करने से बचना चाहिए। यदि किसी अपरिहार्य कारणवश पूर्व दिशा में यात्रा करना अत्यंत आवश्यक हो, तो घर से निकलने से पूर्व थोड़ा सा अदरक, तिल या लौंग खाकर और शनिदेव या भगवान हनुमान का स्मरण करके ही प्रस्थान करें। इससे यात्रा में आने वाली रुकावटें और विघ्न दूर होते हैं।

शनिवार और अष्टमी श्राद्ध के विशेष कल्याणकारी उपाय

आज के दिन शनि के नकारात्मक प्रभावों को शांत करने और पितरों की असीम कृपा प्राप्त करने के लिए कुछ उपाय बेहद प्रभावशाली साबित होते हैं। काले कुत्ते को सरसों के तेल से चुपड़ी रोटी खिलाएं। पीपल के वृक्ष में जल, कच्चा दूध, काले तिल और गंगाजल अर्पित करें। हनुमान चालीसा या सुंदरकांड का पाठ करें, जिससे शनि की ढैय्या या साढ़ेसाती के कष्टों से राहत मिलती है। पितरों के निमित्त काले तिल, उड़द की दाल, छाता, जूते या गर्म वस्त्रों का दान किसी निर्धन व्यक्ति को करने से परिवार पर आने वाली समस्त विपदाएं टल जाती हैं।