इंडोनेशिया के साथ $200 मिलियन की महा-डील, खरीदारों की कतार में कई मुस्लिम देश; बीजिंग में हड़कंप
वैश्विक रक्षा बाजार (Global Defense Market) में भारत की रणनीतिक ताकत और सैन्य आत्मनिर्भरता का नया परचम लहरा रहा है। भारत की स्वदेशी सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल 'ब्रह्मोस' (BrahMos) वर्तमान में दुनिया के रक्षा विश्लेषकों के लिए सबसे हॉट केक बनी हुई है। जमीन, युद्धपोत, पनडुब्बी और लड़ाकू विमान से दागी जाने वाली दुनिया की इस इकलौती सुपरसोनिक मिसाइल को अपनी सेना में शामिल करने के लिए दुनिया भर के देशों में होड़ मची है। साल 2022 तक जिस मिसाइल का कोई विदेशी खरीदार नहीं था, आज उसके ग्राहकों की सूची लगातार लंबी होती जा रही है। फिलीपींस और वियतनाम की ऐतिहासिक डील्स के बाद, अब दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम बहुल देश इंडोनेशिया भारत की ब्रह्मोस का तीसरा सबसे बड़ा खरीदार बनने जा रहा है, जिससे दक्षिण चीन सागर में शक्ति संतुलन पूरी तरह बदलने की उम्मीद है।
इंडोनेशिया के साथ 200 मिलियन डॉलर का बड़ा करार: जल्द होगा औपचारिक कॉन्ट्रैक्ट
रक्षा मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार, ब्रह्मोस एयरोस्पेस और इंडोनेशिया के रक्षा मंत्रालय के बीच मंगलवार को एक बेहद संवेदनशील और रणनीतिक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए हैं। लगभग 200 मिलियन डॉलर के इस करार के तहत इंडोनेशिया चरणबद्ध तरीके से भारत से ब्रह्मोस मिसाइल की दो अत्याधुनिक बैटरियां खरीदेगा, जिसका औपचारिक और अंतिम कॉन्ट्रैक्ट भी बेहद जल्द साइन कर लिया जाएगा।
सैन्य विशेषज्ञों के मुताबिक, ब्रह्मोस की एक सामान्य परिचालन बैटरी में 4 मोबाइल ऑटोनॉमस लॉन्चर, 12 रेडी-टू-फायर (हमले के लिए तैयार) मिसाइलें, एक आधुनिक मोबाइल कमांड पोस्ट, ट्रैकिंग रडार और सहायक सपोर्ट व्हीकल्स शामिल होते हैं, जो इंडोनेशिया की तटीय सुरक्षा को अभेद्य बना देंगे।
वियतनाम और फिलीपींस के बेड़े में पहले ही शामिल हुई भारतीय मारक क्षमता
इंडोनेशिया से पहले भारत के पूर्वी पड़ोसी देशों ने अपनी रक्षा जरूरतों के लिए भारत पर भरोसा जताया था। साल 2022 में फिलीपींस ने तटीय सुरक्षा को मजबूत करने के लिए एंटी-शिप मिसाइल बैटरियों के लिए 375 मिलियन डॉलर का समझौता किया था, जिसकी सफल डिलीवरी भारत द्वारा पूरी की जा चुकी है।
इसके बाद, वियतनाम के साथ करीब 629 मिलियन डॉलर की एक और महा-डील को अंतिम रूप दिया गया था। सिंगापुर में आयोजित प्रतिष्ठित 'शांगरी-ला डायलॉग' के दौरान भारत के रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने आधिकारिक तौर पर वियतनाम डील की पुष्टि की थी, जिसने भारतीय रक्षा उद्योग के बढ़ते वैश्विक दबदबे को प्रमाणित किया था।
चीन के दुश्मनों की ढाल बनी ब्रह्मोस: दक्षिण चीन सागर में ड्रेगन की बढ़ी टेंशन
यदि हम ब्रह्मोस मिसाइल के मौजूदा खरीदारों के भौगोलिक और रणनीतिक पैटर्न को देखें, तो एक बेहद दिलचस्प और महत्वपूर्ण तथ्य उभर कर सामने आता है। फिलीपींस, वियतनाम और इंडोनेशिया— इन तीनों ही एशियाई देशों का दक्षिण चीन सागर (South China Sea) के विवादित जलक्षेत्र में चीन के साथ गंभीर समुद्री और सीमा विवाद चल रहा है।
ये सभी देश चीन की आक्रामक विस्तारवादी नीतियों और उसकी विशाल नौसैनिक ताकत का मुकाबला करने के लिए भारत की ब्रह्मोस मिसाइल को एक अचूक और अचूक 'सैन्य प्रतिरोधी' (Deterrence) हथियार के रूप में देख रहे हैं। हालांकि, चीन विवादित जलक्षेत्र वाले देशों को भारत द्वारा ऐसी अत्याधुनिक मिसाइलों की बिक्री किए जाने पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कई बार अपनी तीखी आपत्ति और नाराजगी दर्ज करा चुका है, लेकिन भारत ने बीजिंग के दबाव को पूरी तरह दरकिनार कर दिया है।
'ऑपरेशन सिंदूर' की सफलता ने चौंकाया: चीनी डिफेंस सिस्टम को भेदने के बाद मची होड़
वैश्विक स्तर पर ब्रह्मोस मिसाइल की मांग और उसकी साख पिछले साल हुए भारत के गुप्त 'ऑपरेशन सिंदूर' के बाद रॉकेट की रफ्तार से बढ़ी है। इस वास्तविक सैन्य ऑपरेशन के दौरान ब्रह्मोस ने पड़ोसी देश पाकिस्तान में तैनात चीनी मूल के अत्याधुनिक एयर डिफेंस नेटवर्क को न केवल पूरी तरह से छकाया, बल्कि उसे सफलतापूर्वक भेदते हुए अपने अचूक प्रहार का लोहा मनवाया था।
इस ऑपरेशन ने दुनिया भर के सैन्य जनरलों को यह संदेश दे दिया कि चीनी एयर डिफेंस सिस्टम ब्रह्मोस की रफ्तार को रोकने में पूरी तरह नाकाम हैं, जिसके बाद से इसे खरीदने के लिए देशों की लाइन लग गई।
यूएई भी कतार में शामिल: पश्चिमी देशों पर निर्भरता कम करना चाहता है अबू धाबी
इंडोनेशिया के अलावा एक और शक्तिशाली खाड़ी देश संयुक्त अरब अमीरात (UAE) भी अपने रक्षा बेड़े को भारतीय हथियारों से लैस करने के लिए भारत सरकार के साथ लगातार बातचीत के दौर में है। यूएई भारत से न केवल ब्रह्मोस मिसाइलें, बल्कि भारत का स्वदेशी 'आकाशतीर' एयर डिफेंस कमांड एंड Control सिस्टम भी खरीदना चाहता है।
हालिया ईरान संघर्ष और सऊदी-पाकिस्तान के बीच बदलते सैन्य समझौतों के बाद खाड़ी क्षेत्र के रणनीतिक समीकरण बहुत तेजी से बदल रहे हैं। ऐसे में अबू धाबी अपनी सैन्य जरूरतों के लिए अमेरिका या पश्चिमी देशों पर अपनी पारंपरिक निर्भरता को कम करना चाहता है और भारत को एक मजबूत व तटस्थ सैन्य साझीदार के रूप में देख रहा है।
खुद रूस भी अपने जहाजों के लिए चाहता है ब्रह्मोस: यूक्रेन युद्ध का दिखा असर
लंबे समय से चल रहे यूक्रेन युद्ध की वजह से रूस के अपने मिसाइल स्टॉक और उत्पादन क्षमता पर भारी दबाव पड़ा है। अंतरराष्ट्रीय खुफिया सूत्रों के हवाले से खबर है कि रूस अब खुद अपने नौसैनिक युद्धपोतों और क्रूजर जहाजों को आधुनिक बनाने के लिए भारत के साथ मिलकर बनाई गई ब्रह्मोस मिसाइल को अपने बेड़े में शामिल करने पर गंभीरता से विचार कर रहा है।
यह पहली बार होगा जब भारत से कोई बड़ा सैन्य हार्डवेयर वापस रूस भेजा जा सकता है।
जॉइंट वेंचर का गणित और एक्सपोर्ट के कड़े अंतरराष्ट्रीय नियम: क्या है सच?
ब्रह्मोस एयरोस्पेस वास्तव में साल 1998 में भारत के रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO - 50.5% हिस्सेदारी) और रूस की एनपीओ मशीनोस्ट्रोयेनिया (NPO Mashinostroyenia - 49.5% हिस्सेदारी) के बीच शुरू किया गया एक बेहद सफल जॉइंट वेंचर है। दोनों देशों के बीच हुए समझौते के मुताबिक, किसी भी तीसरे देश को ब्रह्मोस मिसाइल का एक्सपोर्ट करने के लिए मॉस्को (रूस) की लिखित सहमति अनिवार्य होती है। दिसंबर 2024 में भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के साथ हुई उच्च स्तरीय बैठक के दौरान रूसी रक्षा मंत्री एंड्री बेलौसोव ने वियतनाम और इंडोनेशिया को मिसाइल बेचने के लिए रूस की तरफ से आधिकारिक मंजूरी दे दी थी।
अंतरराष्ट्रीय मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम (MTCR) के कड़े दिशा-निर्देशों के तहत, वैश्विक बाजार में एक्सपोर्ट की जाने वाली ब्रह्मोस मिसाइलों की अधिकतम मारक क्षमता को 290 किलोमीटर तक ही सीमित रखा गया है, ताकि अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन न हो। हालांकि, भारत अपनी सेना के लिए 450 किलोमीटर से भी ज्यादा की मारक रेंज वाली उन्नत ब्रह्मोस मिसाइलें तैयार कर चुका है। 2.8 मैक (ध्वनि की गति से लगभग तीन गुना तेज) की तूफानी रफ्तार से उड़ान भरने वाली इस मिसाइल की मार से बचना किसी भी आधुनिक युद्धपोत या रडार सिस्टम के लिए आज भी असंभव माना जाता है।