पितृपक्ष में इस बार 16 नहीं 15 दिनों का होगा महालय: एक तिथि के क्षय से घटेगा एक दिन
सनातन धर्म में पितरों के प्रति श्रद्धा, तर्पण और पिंडदान का महापर्व 'पितृपक्ष' इस बार एक विशेष ज्योतिषीय और खगोलीय गणना के कारण चर्चा के केंद्र में है। अमूमन भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास की सर्वपितृ अमावस्या तक पितृपक्ष पूरे 16 दिनों की अवधि का होता है। किंतु इस बार पंचांग में एक तिथि का क्षय (ह्रास) होने की वजह से पितृपक्ष का यह पावन कालखंड 16 दिनों के बजाय केवल 15 दिनों में ही संपन्न हो जाएगा।
ज्योतिष शास्त्र और धर्मसिंधु के अनुसार, जब कोई तिथि सूर्योदय के बाद शुरू होकर अगले सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो जाती है, तो उसे 'तिथि क्षय' कहा जाता है। पंचांगीय फेरबदल के कारण दो प्रमुख श्राद्ध तिथियों का संयोग एक ही दिन बन रहा है, जिससे श्राद्ध करने वाले श्रद्धालुओं और यजमानों के मन में तिथियों के चयन को लेकर गहरा संशय पैदा हो गया है। आइए समझते हैं कि किस तिथि का क्षय हुआ है, कौन सी दो तिथियों का श्राद्ध एक ही दिन संपन्न होगा और तर्पण के लिए शास्त्रसम्मत नियम क्या कहते हैं।
किस तिथि का हुआ क्षय और कौन सी दो श्राद्ध तिथियां पड़ रही हैं एक ही दिन?
पंचांग गणना के अनुसार, पितृपक्ष के दौरान तिथियों की घट-बढ़ के कारण इस बार तृतीया और चतुर्थी तिथि का अद्भुत संयोग एक ही दिन बन रहा है। तृतीया तिथि का आरंभ दोपहर से पूर्व होकर रात्रि में समाप्त हो जाने और चतुर्थी तिथि के समय चक्र के कारण दोनों तिथियों के निमित्त तर्पण एवं श्राद्ध कर्म एक ही दिन आयोजित किए जाएंगे।
एक ही दिन दो श्राद्ध: जिन पूर्वजों का देहावसान किसी भी मास के कृष्ण या शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हुआ हो और जिनका देहांत चतुर्थी तिथि को हुआ हो, उन दोनों का श्राद्ध कर्म पंचांग के नियमानुसार एक ही दिन के अपराह्न काल में संपन्न किया जाएगा।
तिथि निर्णय का शास्त्रोक्त नियम: गरुड़ पुराण और हेमाद्रि के अनुसार, श्राद्ध के लिए 'कुतुप' और 'रौहिणी' मुहूर्त यानी दोपहर व्यापिनी तिथि को प्रधानता दी जाती है। जब एक ही दिन में दोनों तिथियां कुतुप और अपराह्न काल को स्पर्श करती हैं, तो विद्वान पुरोहितों के परामर्श से उस दिन दोनों तिथियों के पितरों का पिंडदान और ब्राह्मण भोज एक साथ करने का विधान है।
पितृपक्ष 2026: 15 दिनों का संपूर्ण प्रामाणिक श्राद्ध कैलेंडर
पितरों की आत्मिक शांति और तृप्ति के लिए अपनी-अपनी तिथियों के अनुसार श्राद्ध कर्म करना अनिवार्य होता है। 15 दिनों के इस संक्षिप्त पितृपक्ष का क्रमवार कैलेंडर इस प्रकार रहेगा:
पहला दिन (पूर्णिमा श्राद्ध): भाद्रपद पूर्णिमा — पूर्णिमा तिथि पर दिवंगत हुए परिजनों और संतों के निमित्त प्रथम श्राद्ध।
दूसरा दिन (प्रतिपदा श्राद्ध): आश्विन कृष्ण प्रतिपदा — नाना-नानी और प्रतिपदा तिथि पर मृत पूर्वजों का श्राद्ध।
तीसरा दिन (द्वितीया श्राद्ध): आश्विन कृष्ण द्वितीया तिथि का श्राद्ध।
चौथा दिन (तृतीया एवं चतुर्थी श्राद्ध का महासंयोग): आश्विन कृष्ण तृतीया एवं चतुर्थी तिथि का एक साथ श्राद्ध कर्म।
पांचवां दिन (पंचमी श्राद्ध): आश्विन कृष्ण पंचमी तिथि — अविवाहित मृत परिजनों के निमित्त विशेष तर्पण।
छठा दिन (षष्ठी श्राद्ध): आश्विन कृष्ण षष्ठी तिथि का श्राद्ध।
सातवां दिन (सप्तमी श्राद्ध): आश्विन कृष्ण सप्तमी तिथि का श्राद्ध।
आठवां दिन (अष्टमी श्राद्ध): आश्विन कृष्ण अष्टमी तिथि का श्राद्ध।
नौवां दिन (मातृ नवमी श्राद्ध): आश्विन कृष्ण नवमी — माता, दादी, नानी, सास और कुल की समस्त सुहागिन महिलाओं के लिए सबसे बड़ा श्राद्ध दिन।
दसवां दिन (दशमी श्राद्ध): आश्विन कृष्ण दशमी तिथि का श्राद्ध।
ग्यारहवां दिन (एकादशी श्राद्ध): आश्विन कृष्ण एकादशी — संन्यासियों, यतियों और वैष्णवों का श्राद्ध।
बारहवां दिन (द्वादशी श्राद्ध): आश्विन कृष्ण द्वादशी (सन्यास ग्रहण कर चुके परिजनों हेतु)।
तेरहवां दिन (त्रयोदशी श्राद्ध): आश्विन कृष्ण त्रयोदशी — परिवार के मृत छोटे बच्चों के लिए श्राद्ध।
चौदहवां दिन (चतुर्दशी / मघा श्राद्ध): आश्विन कृष्ण चतुर्दशी (अकाल मृत्यु, अस्त्र-शस्त्र, दुर्घटना या विष से मृत परिजनों के निमित्त)।
पंद्रहवां दिन (सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या): आश्विन कृष्ण अमावस्या — सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों की विदाई, महालय समापन और पितृ विसर्जन।
श्राद्ध कर्म के लिए कुतुप, रौहिणी और अपराह्न काल का महत्व
शास्त्रों में स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि पितरों का तर्पण कभी भी सुबह-सुबह सूर्योदय के तुरंत बाद या शाम को सूर्यास्त के समय नहीं करना चाहिए। पितरों का काल मध्याह्न (दोपहर) माना गया है:
कुतुप मुहूर्त: सुबह 11:45 बजे से दोपहर 12:35 बजे तक (पितरों को हविष्य और जल अर्पण का सबसे श्रेष्ठ समय)।
रौहिणी मुहूर्त: दोपहर 12:35 बजे से दोपहर 01:25 बजे तक (ब्राह्मण भोजन और पिंडदान के लिए उत्तम)।
अपराह्न काल: दोपहर 01:25 बजे से दोपहर 03:40 बजे तक। इस अवधि के भीतर श्राद्ध से जुड़े सभी कर्मकांड अनिवार्य रूप से संपन्न हो जाने चाहिए।
एक दिन कम होने पर क्या करें व्रती और यजमान? इन विशेष नियमों का रखें ध्यान
पितृपक्ष की अवधि 15 दिन होने के कारण श्रद्धालुओं को कुछ खास बातों का ध्यान रखना चाहिए ताकि पितृ तर्पण में किसी प्रकार की त्रुटि न रहे:
दोनों तिथियों का अलग-अलग पिंडदान: जिस दिन दो तिथियां एक साथ पड़ रही हों, उस दिन दोनों पितरों के नाम से अलग-अलग कुश की पवित्री धारण कर अलग-अलग पिंड और तिल-जल से तर्पण अर्पित करें।
पंचबलि का विशेष विधान: भोजन तैयार होने के बाद गाय, कुत्ते, कौवे, चींटी और देव-ब्राह्मण के लिए पांच हिस्से (पंचबलि) अवश्य निकालें। कौवे को पितरों का दूत माना गया है, इसलिए उसका ग्रास कभी न भूलें।
अमावस्या पर करें संशय का समाधान: यदि किसी कारणवश आप तिथि के क्षय होने से संशय में हैं या अपने पूर्वज की सही मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं कर पा रहे हैं, तो आश्विन कृष्ण अमावस्या (सर्वपितृ अमावस्या) के दिन उनका श्राद्ध पूरी श्रद्धा से कर सकते हैं। अमावस्या के दिन किए गए श्राद्ध से सभी 16 दिनों के पितर तृप्त होकर आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
सात्विकता और संयम: इन 15 दिनों में घर का वातावरण पूर्णतः सात्विक रखें। तामसिक भोजन जैसे लहसुन, प्याज, मांस-मदिरा का त्याग करें और घर में किसी भी नए मांगलिक कार्य, मुंडन, गृह प्रवेश या नवीन खरीदारी से बचें।