क्या ईरान पर सीधा हमला बोलेगा अमेरिका? तीसरे एयरक्राफ्ट कैरियर के साथ 10,000 सैनिक रवाना
मध्य पूर्व (Middle East) में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और संभावित युद्ध के बादलों के बीच अमेरिका ने एक असाधारण सैन्य कदम उठाया है। पेंटागन ने तीसरे विमानवाहक पोत (Aircraft Carrier) 'यूएसएस थियोडोर रूजवेल्ट' (USS Theodore Roosevelt) के स्ट्राइक ग्रुप और नौसैनिक एम्फीबियस जहाजों को खाड़ी क्षेत्र के लिए रवाना कर दिया है। इस नए सैन्य दल के साथ लगभग 7,000 नाविक और 2,000 से अधिक मरीन कमांडो सहित करीब 9,000 से 10,000 अतिरिक्त अमेरिकी सैनिकों की तैनाती की जा रही है।
इस रणनीतिक कदम के बाद मध्य पूर्व में सक्रिय अमेरिकी नौसैनिकों और मरीन सैनिकों की कुल तादाद 20,000 के पार पहुंच जाएगी। सैन्य जानकारों के अनुसार, 2003 में इराक पर हुए अमेरिकी आक्रमण के बाद यह पहला मौका है जब फारस की खाड़ी और आसपास के जलक्षेत्र में एक साथ तीन अमेरिकी कैरियर स्ट्राइक ग्रुप्स का जमावड़ा देखा जा रहा है। इस अप्रत्याशित तैनाती ने यह बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या अमेरिका ईरान के भीतर घुसकर बड़े पैमाने पर हवाई और मिसाइल हमले करने की अंतिम तैयारी कर रहा है?
क्या ईरान के भीतर घुसकर सीधे हमले की योजना है?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा हाल के साक्षात्कारों में ईरान के खिलाफ नए और कड़े हमलों के संकेत दिए जाने के बाद इस तैनाती को महज गश्त नहीं बल्कि एक 'युद्ध पूर्व तैयारी' माना जा रहा है। हालांकि, अमेरिकी रक्षा विभाग की ओर से जमीनी सेना को ईरान की सीमा में उतारने (Ground Invasion) का कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार रणनीति सीधे तौर पर तीन मोर्चों पर केंद्रित है:
परमाणु व रणनीतिक ठिकानों पर प्रहार: अमेरिका लगातार यह दोहराता रहा है कि वह ईरान को किसी भी सूरत में परमाणु हथियार विकसित नहीं करने देगा। यह भारी सैन्य जमावड़ा जरूरत पड़ने पर ईरान के भूमिगत यूरेनियम संवर्धन केंद्रों और बैलिस्टिक मिसाइल लॉन्च पैड्स पर लक्षित हवाई बमबारी करने की पूर्ण क्षमता देता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) की पूर्ण सुरक्षा: दुनिया के लगभग 20% कच्चे तेल का परिवहन इसी जलमार्ग से होता है। ईरान द्वारा व्यापारिक जहाजों को रोकने या मार्ग बाधित करने की स्थिति में अमेरिकी नौसेना तेल सप्लाई लाइनों को खुला रखने के लिए बल प्रयोग कर सकती है।
क्षेत्रीय सहयोगियों को रक्षा कवच: इजरायल, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात सहित खाड़ी सहयोगियों के तेल व गैस इंफ्रास्ट्रक्चर को ईरानी ड्रोन या मिसाइल हमलों से सुरक्षित रखना इस आक्रामक तैनाती का मुख्य उद्देश्य है।
नौसैनिक बेड़े की संरचना: विध्वंसक पोत, क्रूजर और एम्फीबियस ताकत
रवाना किए गए नए बेड़े में केवल एयरक्राफ्ट कैरियर ही शामिल नहीं है, बल्कि उसके साथ निर्देशित मिसाइल क्रूजर 'यूएसएस चोसिन' (USS Chosin) और कई गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रॉयर तैनात हैं जो फाइटर जेट्स, अर्ली वार्निंग राडार और एयर डिफेंस मिसाइलों से लैस हैं।
इसके अतिरिक्त, 'यूएसएस मेकिन आइलैंड' (USS Makin Island) एम्फीबियस रेडीनेस ग्रुप को भी भेजा गया है, जिसमें यूएसएस जॉन पी. मुर्था और यूएसएस एंकोरेज जैसे अत्याधुनिक लैंडिंग शिप शामिल हैं। इनमें भारी हथियारों से लैस मरीन इन्फैंट्री और लड़ाकू हेलिकॉप्टरों का पूरा दस्ता मौजूद है, जो किसी भी आपात स्थिति में तटीय क्षेत्रों में त्वरित कमांडो ऑपरेशन को अंजाम दे सकता है। पहले से ही इस क्षेत्र में 'यूएसएस जॉर्ज वॉशिंगटन' और 'यूएसएस बॉक्सर' जैसे युद्धपोत सक्रिय निगरानी कर रहे हैं।
वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी घबराहट: तेल की कीमतों में उछाल
मध्य पूर्व में अमेरिकी नौसेना की इस भारी लामबंदी और युद्ध के बढ़ते खतरे का सीधा असर वैश्विक कमोडिटी बाजारों पर देखने को मिल रहा है। तेल आपूर्ति बाधित होने की आशंका के चलते अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर 103 डॉलर के आसपास पहुंच गई हैं।
आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच खुला संघर्ष छिड़ता है, तो फारस की खाड़ी से तेल का निर्यात पूरी तरह ठप हो सकता है, जिससे दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में ऐतिहासिक उछाल और महंगाई का नया संकट पैदा हो जाएगा। संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय कूटनीतिज्ञ दोनों पक्षों से अधिकतम संयम बरतने की अपील कर रहे हैं, लेकिन अमेरिकी हथियारों और सैनिकों की लगातार बढ़ती आमद यह स्पष्ट संकेत दे रही है कि कूटनीति के रास्ते तेजी से बंद हो रहे हैं।