क्या खत्म हो जाएगा H-1B वीजा? अमेरिका की नई सख्त नीतियों से भारतीय प्रोफेशनल्स में हड़कंप
अमेरिकी वीजा नियमों को लेकर एक बार फिर दुनिया भर में चर्चा छिड़ गई है और इसका सबसे ज्यादा असर भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स और टेक कंपनियों पर देखने को मिल रहा है। सोशल मीडिया और कूटनीतिक गलियारों में यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या अमेरिका H-1B वीजा को पूरी तरह खत्म करने की तैयारी में है। हालांकि, कानूनी और नीतिगत वास्तविकता यह है कि H-1B वीजा प्रोग्राम को पूरी तरह से बंद नहीं किया जा रहा है, लेकिन ट्रंप प्रशासन द्वारा इस पर लागू की जा रही नई शर्तें और कड़े प्रस्ताव इसे पहले से कहीं अधिक जटिल और चुनौतीपूर्ण बना रहे हैं। अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) और प्रशासन के हालिया कदमों का मुख्य मकसद विदेशी कामगारों की निर्भरता कम करना और स्थानीय अमेरिकी कर्मचारियों को प्राथमिकता देना है।
60 दिनों के ग्रेस पीरियड को खत्म करने का नया प्रस्ताव
भारतीय कर्मचारियों के लिए सबसे बड़ा झटका वह नया प्रस्ताव है, जिसके तहत नौकरी जाने के बाद मिलने वाले 60 दिनों के ग्रेस पीरियड को समाप्त करने की योजना बनाई गई है। मौजूदा नियमों के तहत, अगर किसी H-1B वीजा धारक की नौकरी छूट जाती है या कंपनी छंटनी करती है, तो उसे अमेरिका में रहकर दूसरी नौकरी खोजने या अपना कानूनी स्टेटस बदलने के लिए 60 दिन की मोहलत मिलती है। नए ड्राफ्ट नियम के लागू होने के बाद, रोजगार समाप्त होते ही विदेशी नागरिक का लीगल स्टेटस तुरंत खतरे में आ सकता है और उन्हें बिना अतिरिक्त समय मिले देश छोड़ने की नौबत आ सकती है। इस प्रस्ताव पर सार्वजनिक टिप्पणियां मांगी जा रही हैं, लेकिन इसने अमेरिकी टेक सेक्टर में काम कर रहे लाखों भारतीयों के मन में अनिश्चितता का माहौल पैदा कर दिया है।
भारी फीस और कड़े नियमों का वित्तीय बोझ
प्रशासन केवल नियमों को ही सख्त नहीं कर रहा, बल्कि कंपनियों के लिए विदेशी कर्मचारियों को स्पॉन्सर करना आर्थिक रूप से भी बेहद महंगा बनाने की कोशिश में है। हाल ही में H-1B वीजा याचिकाओं पर एक लाख डॉलर से अधिक की अतिरिक्त नियामक फीस लगाने के प्रस्तावों और एंट्री रिस्ट्रिक्शंस को लेकर भारी कानूनी विवाद सामने आया है। हालांकि, अमेरिकी अदालतों ने पूर्व में अत्यधिक फीस से जुड़े कुछ प्रावधानों को खारिज या रोका है, लेकिन प्रशासन लगातार नए कार्यकारी आदेशों और समीक्षा तंत्र के जरिए कंपनियों पर निगरानी बढ़ा रहा है। कई अमेरिकी राज्यों के अटॉर्नी जनरल और उद्योग संगठनों ने इन भारी फीसों का विरोध करते हुए कहा है कि इससे स्वास्थ्य, तकनीक और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में कुशल प्रोफेशनल्स की भारी किल्लत हो जाएगी।
भारतीय आईटी कंपनियों और प्रोफेशनल्स पर क्या होगा असर?
भारत के बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे और नोएडा जैसे प्रमुख आईटी हब से हर साल हजारों सॉफ्टवेयर इंजीनियर और टेक प्रोफेशनल्स H-1B वीजा के जरिए अमेरिका का रुख करते हैं। यदि 60-दिन की सुरक्षा हटती है और आवेदन प्रक्रिया पर पाबंदियां और सख्त होती हैं, तो कंपनियों को अपनी हायरिंग और ऑनसाइट डिप्लॉयमेंट की रणनीति पूरी तरह बदलनी होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय कंपनियों को अब 'ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स' (GCC) और रिमोट वर्क मॉडल पर ज्यादा भरोसा करना पड़ेगा। कुल मिलाकर, H-1B वीजा कानूनन खत्म नहीं हो रहा है, लेकिन इसे इतना कड़ा और जोखिम भरा बनाया जा रहा है कि भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए अमेरिका में टिके रहना पहले से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।