UN और महाशक्तियों को मंच से लताड़ने वाले 81 वर्षीय शख्स कौन? जानिए ब्राजील के राष्ट्रपति लूला का वो भाषण जिसने हिला दिया वैश्विक मंच
न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के ऐतिहासिक मंच पर जहां एक तरफ महाशक्तियां अपनी सैन्य ताकत, व्यापारिक टैरिफ और एकतरफा फैसलों की धौंस जमा रही थीं, वहीं दूसरी तरफ मंच से उठी एक 81 वर्षीय अनुभवी नेता की आवाज ने पूरी दुनिया को सन्न कर दिया। संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के 81वें वार्षिक सत्र में परंपरा के अनुसार पहला भाषण देने आए ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला डा सिल्वा (Luiz Inácio Lula da Silva) ने किसी लाग-लपेट के बिना वैश्विक व्यवस्था को सीधे कठघरे में खड़ा कर दिया।
लूला ने मंच से दो टूक सवाल दागा कि अगर संयुक्त राष्ट्र और दुनिया के बड़े देश युद्धों, भूख, पर्यावरण संकट और असमानता को रोकने में पूरी तरह लाचार हैं, तो आखिर वे कर क्या रहे हैं? पूरी दुनिया में फसाद, टकराव और तबाही फैली है और वैश्विक संस्थाएं केवल मूकदर्शक बनी बैठी हैं।
कौन हैं लुइज़ इनासियो लूला डा सिल्वा?
81 वर्ष के हो चुके लुइज़ इनासियो लूला डा सिल्वा सिर्फ ब्राजील के राष्ट्रपति ही नहीं, बल्कि 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील देशों) की सबसे बुलंद और निडर आवाजों में गिने जाते हैं।
मजदूर से सत्ता के शीर्ष तक: लूला का जीवन किसी सिनेमाई संघर्ष से कम नहीं रहा है। बेहद गरीब परिवार में जन्मे लूला ने कभी जूते पॉलिश किए, मेटल फैक्ट्री में वर्कर रहे और ट्रेड यूनियन के जरिए अपनी पहचान बनाई।
तीसरी बार राष्ट्रपति: वे वर्ष 2003 से 2010 तक ब्राजील के राष्ट्रपति रहे, जिस दौरान उन्होंने करोड़ों लोगों को घोर गरीबी से बाहर निकाला। राजनीतिक षड्यंत्रों, जेल की सजा और लंबी कानूनी लड़ाई के बाद 2022 में उन्होंने शानदार वापसी की और रिकॉर्ड तीसरी बार देश के राष्ट्रपति बने।
ग्लोबल साउथ और ब्रिक्स के शिल्पकार: लूला भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और ब्रिक्स (BRICS) जैसे बहुध्रुवीय मंचों के सबसे बड़े पैरोकार माने जाते हैं, जो हमेशा पश्चिमी वर्चस्व के खिलाफ विकासशील देशों की संप्रभुता के लिए आवाज उठाते रहे हैं।
'पूरी दुनिया में तबाही और संस्थाएं पंगु': लूला के भाषण के तीखे बाण
संयुक्त राष्ट्र के पोडियम पर खड़े होकर लूला डा सिल्वा ने सुरक्षा परिषद और संयुक्त राष्ट्र की कार्यशैली की धज्जियां उड़ा दीं। उन्होंने कहा कि 1945 में जिस उद्देश्य के साथ इस संस्था की स्थापना हुई थी, आज वह पूरी तरह पंगु नजर आ रही है।
संयुक्त राष्ट्र पर प्रहार: लूला ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) अपनी विश्वसनीयता पूरी तरह खो चुकी है। जब स्थायी सदस्य देश (P5) अपनी मर्जी से युद्ध थोपते हैं, एकतरफा वीटो का इस्तेमाल करते हैं और अंतरराष्ट्रीय कानूनों की धज्जियां उड़ाते हैं, तो यह संस्था सिर्फ भाषण देने का एक क्लब बनकर रह जाती है। लूला ने भारत, ब्राजील और अफ्रीकी देशों को सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता देने की मांग फिर दोहराई।
गाजा और यूक्रेन संकट पर गुस्सा: लूला ने गाजा में महिलाओं और बच्चों पर हो रहे हमलों और यूक्रेन में जारी खून-खराबे पर गहरी पीड़ा जताई। उन्होंने कहा कि दुनिया के सबसे ताकतवर देश शांति वार्ता कराने के बजाय हथियारों की अंधी दौड़ और रक्षा कंपनियों के मुनाफे को बढ़ावा दे रहे हैं।
जलवायु संकट पर अमीर देशों का पाखंड: उन्होंने अमीर पश्चिमी देशों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि वे पर्यावरण बचाने के बड़े-बड़े वादे तो करते हैं, लेकिन जब विकासशील देशों को फंड देने की बात आती है, तो उनके हाथ पीछे खिंच जाते हैं।
ट्रंप की 'टैरिफ नीति' और आर्थिक तानाशाही पर सीधा हमला
लूला का यह आक्रामक भाषण अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा संयुक्त राष्ट्र में दिए गए उन बयानों के बिल्कुल विपरीत था, जिसमें ट्रंप ने 100% टैरिफ लगाने और एकतरफा फैसलों से जंग रुकवाने की धमकी दी थी।
लूला ने बिना नाम लिए ट्रंप और पश्चिमी देशों की 'आर्थिक दादागिरी' पर निशाना साधते हुए कहा कि व्यापारिक प्रतिबंध, मनमाने टैरिफ और प्रतिबंधों (Sanctions) को हथियार बनाकर कमजोर और विकासशील देशों को दबाने की कोशिशें अस्वीकार्य हैं। उन्होंने कहा कि आज दुनिया को किसी एक देश की हुकूमत या 'कोल्ड वॉर' जैसी नई धड़ेबंदी की जरूरत नहीं है, बल्कि एक निष्पक्ष और समावेशी वैश्विक व्यवस्था की दरकार है।
दुनिया भर में क्यों हो रही है लूला के भाषण की चर्चा?
81 साल की उम्र में भी लूला डा सिल्वा के इस भाषण ने यह साबित कर दिया कि जब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कूटनीतिक औपचारिकताएं और पाखंड हावी हो जाता है, तब कोई एक ऐसा नेता जरूर होना चाहिए जो सच को बेबाकी से कह सके। लूला ने दुनिया के सामने यह कड़वा सच उजागर किया कि जब तक संयुक्त राष्ट्र में लोकतांत्रिक सुधार नहीं होंगे और चंद ताकतों की मनमानी पर लगाम नहीं लगेगी, तब तक दुनिया से युद्ध, गरीबी और अशांति को मिटाना नामुमकिन है।