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October 02 2026 07:42 pm

कब है सर्वपितृ अमावस्या? जानें किन चीजों का दान दिलाएगा पितरों का आशीर्वाद

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सनातन धर्म में पितरों के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता प्रकट करने का सबसे बड़ा महापर्व 'पितृपक्ष' (महालय पक्ष) पूरे श्रद्धाभाव के साथ चल रहा है। मान्यता है कि पितृपक्ष के 16 दिनों के दौरान हमारे पूर्वज अपने परिजनों और संतानों के पास सूक्ष्म रूप में धरती पर आते हैं और उनसे श्रद्धापूर्वक दिए गए जल, अन्न और तर्पण की अपेक्षा रखते हैं। वर्तमान में चल रहे इस पावन पक्ष का समापन आगामी 10 अक्टूबर को होने जा रहा है, जिसे शास्त्रों में 'सर्वपितृ अमावस्या' या 'पितृ विसर्जनी अमावस्या' कहा जाता है। यह दिन पितरों की विदाई का सबसे महत्वपूर्ण अवसर होता है। जिन लोगों को अपने पूर्वजों की देहावसान की सही तिथि याद नहीं होती, या भूलवश किसी पितर का श्राद्ध छूट गया हो, उनके निमित्त सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्राद्ध, तर्पण और दान करने से संपूर्ण पितृदोष शांत हो जाते हैं और कुल में सुख-समृद्धि का वास होता है।

10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या: विदाई के दिन भूले-बिसरे पितरों का तर्पण

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सर्वपितृ अमावस्या पितृपक्ष का अंतिम और सबसे निर्णायक दिन होता है। इस दिन पृथ्वी लोक पर आए सभी पितृगण अपनी संतानों को सुख, शांति और वंश वृद्धि का आशीर्वाद देकर अपने लोक को प्रस्थान करते हैं। इसलिए उनकी विदाई के समय विशेष तर्पण और पिंडदान करना अनिवार्य माना गया है। यदि परिवार में किसी पूर्वज की मृत्यु तिथि का ज्ञान न हो, किसी की अकाल मृत्यु हुई हो या फिर साल भर व्यस्तता व परिस्थितियों के चलते आप उनका नियमित श्राद्ध न कर पाए हों, तो सर्वपितृ अमावस्या पर किया गया एक तर्पण सभी ज्ञात-अज्ञात और भूले-बिसरे पूर्वजों की आत्मा को शांति प्रदान कर देता है। इस दिन पिता पक्ष की तीन पीढ़ियों—पिता, पितामह (दादा) और प्रपितामह (परदादा) के साथ-साथ माता पक्ष की तीन पीढ़ियों—माता, पितामही (दादी) और प्रपितामही (परदादी) के निमित्त मुख्य रूप से श्राद्ध व तर्पण संपन्न किया जाता है।

सर्वपितृ अमावस्या पर क्या दान करना चाहिए: सीधे पितरों तक पहुंचती हैं ये वस्तुएं

गरुड़ पुराण और धर्म शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्रद्धापूर्वक किया गया दान सीधे पितरों तक पहुंचता है। इस दिन किए जाने वाले दान से पितरों की आत्मा तृप्त होती है और वे प्रसन्न होकर आशीर्वाद की वर्षा करते हैं। इस दिन मुख्य रूप से निम्नलिखित वस्तुओं का दान अत्यंत फलदायी माना गया है:

अन्न और काले तिल का दान: पितरों की तृप्ति के लिए काले तिल का दान और तर्पण में उपयोग सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इसके साथ ही गेहूं, चावल या जौ जैसे अनाजों का दान करना चाहिए।

जरूरी दैनिक वस्तुएं: मौसम और पितरों की शांति को ध्यान में रखते हुए पंखा, जल से भरा घड़ा, छाता, जूते-चप्पल और वस्त्रों का दान किसी योग्य ब्राह्मण या जरूरतमंद को देना महापुण्यकारी माना जाता है।

पंचबलि कर्म और गो-सेवा: यदि कोई व्यक्ति विस्तृत श्राद्ध या भारी दान करने में असमर्थ है, तो वह केवल गाय को हरा चारा खिलाकर, कुत्तों और कौवों को भोजन का अंश देकर (पंचबलि कर्म) भी अपने श्राद्ध को पूर्ण और सफल बना सकता है। पशु-पक्षियों को दिया गया यह भोजन पितरों के निमित्त स्वीकार्य होता है।

1 और 2 अक्टूबर: षष्ठी और सप्तमी तिथि के श्राद्ध का समय और संशय

पितृपक्ष में श्राद्ध की तिथियों को लेकर अक्सर लोगों के बीच संशय की स्थिति बन जाती है। शास्त्रसम्मत नियम के अनुसार, श्राद्ध कर्म हमेशा मध्यान्ह अथवा अपराह्न काल (दोपहर का समय) में मिलने वाली तिथि में ही करना सबसे उत्तम और उचित माना जाता है। पंचांगीय गणना के अनुसार षष्ठी तिथि 1 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 35 मिनट से प्रारंभ हो रही है, जो अगले दिन 2 अक्टूबर की सुबह 10 बजकर 15 मिनट पर समाप्त होगी।

चूंकि 1 अक्टूबर को दोपहर और अपराह्न काल में षष्ठी तिथि विद्यमान रहेगी, इसलिए पंचमी और षष्ठी तिथि का मुख्य श्राद्ध 1 अक्टूबर को ही किया जा रहा है। इसके साथ ही कुछ परंपराओं में तिथियों के विस्तार को देखते हुए षष्ठी और सप्तमी का श्राद्ध 2 अक्टूबर को भी संपन्न किया जाएगा। 2 अक्टूबर को सुबह 10 बजकर 15 मिनट के बाद सप्तमी तिथि प्रभावी हो जाएगी, अतः सप्तमी तिथि का श्राद्ध 2 अक्टूबर को सुबह 10:15 बजे के बाद मध्यान्ह काल में संपन्न किया जाना शास्त्रोचित रहेगा।