रूपपुर परमाणु संयंत्र: बांग्लादेश के 'परमाणु शक्ति' बनने की पूरी कहानी और इसमें छिपे 4 बड़े 'झोल'
India News Live,Digital Desk : दक्षिण एशिया के ऊर्जा मानचित्र पर एक नया सितारा उभरा है। बांग्लादेश के पबना जिले में स्थित रूपपुर परमाणु ऊर्जा संयंत्र (Rooppur NPP) में मंगलवार को आधिकारिक तौर पर ईंधन लोडिंग (Fuel Loading) का काम शुरू हो गया। इसके साथ ही बांग्लादेश ने एक बड़ी छलांग लगाते हुए भारत और पाकिस्तान की कतार में अपनी जगह बना ली है। रूस की तकनीकी और वित्तीय मदद से बना यह प्रोजेक्ट बांग्लादेश को 'परमाणु ऊर्जा संपन्न' देशों के क्लब में शामिल करने जा रहा है।
लेकिन, क्या यह सिर्फ विकास की चमकती तस्वीर है? या इसके पीछे कर्ज और कूटनीति का कोई गहरा जाल है? आइए समझते हैं इस पूरी खबर का विश्लेषण।
'परमाणु ताकत' का मतलब क्या है?
अक्सर 'परमाणु ताकत' शब्द को परमाणु बम से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन बांग्लादेश के मामले में इसका अर्थ परमाणु ऊर्जा (Nuclear Energy) से बिजली पैदा करना है। बांग्लादेश अब दुनिया का 33वां ऐसा देश बन गया है जिसके पास परमाणु ऊर्जा से बिजली बनाने की क्षमता है।
रूस का साथ और प्रोजेक्ट की ताकत
क्षमता: इस संयंत्र में 1200-1200 मेगावाट की दो यूनिट्स हैं, यानी कुल 2,400 मेगावाट बिजली का उत्पादन होगा।
लागत: इसकी कुल लागत लगभग 12.65 बिलियन डॉलर (करीब 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक) है।
सहयोग: रूसी कंपनी 'रोसाटॉम' ने यहाँ जेनरेशन 3+ के आधुनिक और सुरक्षित रिएक्टर लगाए हैं।
डेडलाइन: अगस्त 2026 तक पहली यूनिट से 300 मेगावाट बिजली ग्रिड में जुड़ने की उम्मीद है, और दिसंबर तक पूर्ण क्षमता से उत्पादन शुरू हो सकता है।
कहानी के 4 बड़े 'झोल' (चुनौतियां और विवाद)
भले ही यह बांग्लादेश के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि हो, लेकिन इसके पीछे कई ऐसे पेंच फंसे हैं जो आने वाले समय में देश के लिए मुसीबत बन सकते हैं:
1. कर्ज का भारी बोझ (Debt Trap)
इस 12.65 बिलियन डॉलर के प्रोजेक्ट का 90% हिस्सा (लगभग 11.38 बिलियन डॉलर) रूस ने कर्ज के रूप में दिया है। बांग्लादेश की मौजूदा आर्थिक स्थिति को देखते हुए जानकारों का मानना है कि इतनी बड़ी रकम और उसका ब्याज चुकाना देश की अर्थव्यवस्था के लिए 'गले की फांस' बन सकता है।
2. पेमेंट का महा-संकट और प्रतिबंध
रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण रूस पर कड़े अमेरिकी और पश्चिमी प्रतिबंध लगे हैं। रूस को अंतरराष्ट्रीय पेमेंट सिस्टम (SWIFT) से बाहर कर दिया गया है।
झोल: बांग्लादेश चाहकर भी रूस को डॉलर में किश्तें नहीं चुका पा रहा है। बीच में चीनी मुद्रा 'युआन' में भुगतान की कोशिश हुई, लेकिन वह भी कूटनीतिक रूप से जटिल साबित हो रही है।
3. रूस पर 'परम' निर्भरता
यह प्लांट चलाने के लिए कच्चा माल (यूरेनियम) रूस से आएगा और इस्तेमाल किया हुआ खतरनाक परमाणु कचरा (Spent Fuel) रूस ही वापस ले जाएगा। इसका मतलब है कि अगले कई दशकों तक बांग्लादेश की ऊर्जा सुरक्षा की चाबी पूरी तरह से मॉस्को के हाथों में रहेगी।
4. राजनीतिक अस्थिरता और तख्तापलट
यह प्रोजेक्ट पूर्व पीएम शेख हसीना का ड्रीम प्रोजेक्ट था। 2024 में हुए तख्तापलट और हसीना के देश छोड़कर भागने के बाद, अब वहां की अंतरिम सरकार के सामने चुनौती है कि वह रूस के साथ इस प्रोजेक्ट को कैसे आगे बढ़ाती है, जबकि उसे पश्चिमी देशों (विशेषकर अमेरिका) का समर्थन भी चाहिए जो रूस के सख्त खिलाफ हैं।
सुरक्षा पर सवाल
रूपपुर एक घनी आबादी वाला इलाका है और पद्मा नदी के ठीक किनारे स्थित है। विशेषज्ञों का कहना है कि बांग्लादेश जैसे छोटे और सघन देश के लिए किसी भी तकनीकी चूक का परिणाम चेरनोबिल या फुकुशिमा जैसा विनाशकारी हो सकता है, जिसे संभालना ढाका के लिए नामुमकिन होगा।