'पद्मावत' के जौहर सीन पर स्वरा भास्कर के विवादित बयान से फिर गरमाया माहौल, जौहर को महिमामंडित करने पर उठाए थे सवाल
भारतीय सिनेमा के इतिहास में संजय लीला भंसाली द्वारा निर्देशित ऐतिहासिक फिल्म 'पद्मावत' (Padmaavat) अपनी भव्यता, बेजोड़ निर्देशन, शानदार संगीत और ऐतिहासिक विवादों के लिए हमेशा याद की जाती है। फिल्म के क्लाइमेक्स में रानी पद्मिनी (दीपिका पादुकोण) के नेतृत्व में चित्तौड़गढ़ की हजारों वीरांगनाओं द्वारा किए गए 'जौहर' के दृश्य ने सिनेमाघरों में बैठे करोड़ों दर्शकों की आंखें नम कर दी थीं। लाल जोड़े में सजी वीरांगनाओं का धधकती ज्वाला में कूदना राजपूत आन-बान-शान, आत्मसम्मान और बर्बर आक्रांता के सामने न झुकने का सर्वोच्च प्रतीक माना गया था। किंतु अपनी बेबाक और अक्सर विवादित टिप्पणियों के लिए जानी जाने वाली बॉलीवुड अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने इस दृश्य को लेकर एक ऐसा ओपन लेटर लिखा था, जिसने पूरे देश में वैचारिक भूचाल ला दिया था। स्वरा भास्कर ने फिल्म के इस दृश्य को पितृसत्तात्मक, प्रतिगामी और जौहर को महिमामंडित (Glorify) करने वाला बताते हुए बेहद आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया था। स्वरा के इस पुराने बयान और सोच को लेकर सोशल मीडिया पर एक बार फिर बहस छिड़ गई है और यूजर्स उनके इतिहास के अल्पज्ञान और बेतुके तर्कों को लेकर उन्हें जमकर खरी-खोटी सुना रहे हैं।
ओपन लेटर में क्या लिखा था स्वरा ने? 'मुझे लगा जैसे मैं सिर्फ एक योनि बनकर रह गई...'
संजय लीला भंसाली के नाम लिखे अपने लंबे और विस्तृत पत्र में स्वरा भास्कर ने फिल्म के अंतिम 15 मिनट के जौहर दृश्य पर अपनी घोर निराशा और गुस्सा जाहिर किया था। स्वरा ने लिखा था कि पूरी फिल्म देखने के बाद उन्हें ऐसा महसूस हुआ जैसे एक महिला का अस्तित्व केवल उसकी योनि (Vagina) तक ही सीमित है। स्वरा ने अपने पत्र में तर्क दिया था कि फिल्म यह संदेश देती है कि यदि किसी महिला के पति की मृत्यु हो जाती है या कोई विदेशी आक्रांता हमला कर देता है, तो उस महिला के पास आत्महत्या (जौहर) करने के अलावा जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं बचता।
स्वरा ने सवाल उठाते हुए लिखा था, "महिलाएं केवल शरीर या देह नहीं हैं। उन्हें बलात्कार होने के बाद भी, विधवा होने के बाद भी या युद्ध में बंधक बनने के बाद भी जीने का पूरा हक है। क्या एक महिला का जीवन उसके पति या समाज के तथाकथित सम्मान से ज्यादा कीमती नहीं है? क्या जीवित रहना कायरता है और आग में कूद जाना वीरता?" स्वरा ने भंसाली पर 21वीं सदी में सती प्रथा और जौहर जैसी अमानवीय और दर्दनाक प्रथाओं को देशभक्ति और गौरव के चादर में लपेटकर परोसने का गंभीर आरोप लगाया था।
सोशल मीडिया पर फूटा लोगों का भयंकर गुस्सा: 'इतिहास नहीं जानतीं तो बेवकूफी भरी बातें मत करो'
स्वरा भास्कर के इन बयानों और तर्कों के सामने आते ही आम जनता, इतिहासकारों और सिनेमा प्रेमियों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स (एक्स, फेसबुक और इंस्टाग्राम) पर लोगों ने स्वरा को इतिहास का अज्ञानी और 'सस्ते फेमिनिज्म' की शिकार बताते हुए जमकर लताड़ लगाई।
एक यूजर ने तीखा प्रहार करते हुए लिखा, "स्वरा भास्कर को शायद यह नहीं पता कि 14वीं शताब्दी का वह दौर कोई एसी कमरों में बैठकर ट्विटर चलाने वाला दौर नहीं था। वह बर्बर आक्रांता अलाउद्दीन खिलजी का समय था। यदि वे रानियां जौहर न करतीं, तो खिलजी की दरिंदा सेना उनके साथ जो अमानवीय अत्याचार करती और उन्हें हरम की गुलाम बनाती, क्या स्वरा उसे सम्मानजनक जीवन कहतीं? बेवकूफ हो क्या?"
वहीं एक अन्य यूजर ने लिखा, "जौहर कोई सामान्य आत्महत्या या लाचारी नहीं थी; वह एक खूंखार लुटेरे और बलात्कारी के मुंह पर चित्तौड़ की क्षत्राणियों का सबसे बड़ा तमाचा था कि तुम हमारे मृत शरीर को भी छू नहीं सकते। इसे कायरता या केवल देह से जोड़ना भारत की वीरांगनाओं के सर्वोच्च बलिदान का घोर अपमान है।"
जौहर का गौरवशाली और दर्दनाक इतिहास: क्यों किया गया था चित्तौड़ की 16,000 वीरांगनाओं द्वारा आत्मोत्सर्ग?
इतिहास के पन्नों को यदि निष्पक्षता से पढ़ा जाए, तो सन 1303 में चित्तौड़गढ़ पर अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण केवल साम्राज्य विस्तार की लड़ाई नहीं थी, बल्कि वह रानी पद्मिनी के प्रति उसकी घिनौनी हवस का परिणाम था। जब राजा रावल रतन सिंह और उनके वीर सेनापति गोरा-बादल लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए और चित्तौड़ का पतन निश्चित हो गया, तब रानी पद्मिनी और दुर्ग के भीतर मौजूद लगभग 16,000 महिलाओं, बच्चों और दासियों ने खिलजी के हरम में यौन दासी (Sex Slave) बनने और अकल्पनीय यातनाएं सहने के बजाय अग्नि स्नान का मार्ग चुना।
मध्यकालीन युद्धों का यह क्रूर सच था कि पराजित राज्यों की महिलाओं को बाजारों में बेचा जाता था और जीवन भर बलात्कार का शिकार बनाया जाता था। रानी पद्मिनी और राजपूत क्षत्राणियों का यह फैसला अपनी आत्मा, धर्म और अस्मिता को अकलंकित रखने का अंतिम हथियार था। यह बलिदान किसी पुरुष के दबाव में नहीं, बल्कि स्त्रियों द्वारा अपनी इच्छा और सामूहिक स्वाभिमान की रक्षा के लिए लिया गया एक आत्म-निर्णय था।
बॉलीवुड और सेलेब्स ने भी की थी स्वरा की खिंचाई: शाहिद कपूर और सुचित्रा कृष्णमूर्ति के तीखे जवाब
स्वरा भास्कर के इस विवादित ओपन लेटर पर केवल आम जनता ने ही नहीं, बल्कि फिल्म इंडस्ट्री के कई दिग्गज कलाकारों ने भी उन्हें आईना दिखाया था। फिल्म में रावल रतन सिंह का किरदार निभाने वाले अभिनेता शाहिद कपूर ने स्वरा के पत्र पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था, "पद्मावत उस ऐतिहासिक दौर की कहानी है जिसे संदर्भ (Context) के साथ ही समझा जाना चाहिए। उस समय की परिस्थितियां आज से बिल्कुल अलग थीं। फिल्म किसी प्रथा का प्रचार नहीं कर रही है, बल्कि उस समय के ऐतिहासिक यथार्थ और रानी पद्मिनी के सर्वोच्च त्याग को दर्शा रही है। हर चीज को आज के आधुनिक चश्मे से देखकर विवाद खड़ा करना सही नहीं है।"
वहीं जानी-मानी गायिका और अभिनेत्री सुचित्रा कृष्णमूर्ति ने स्वरा पर सीधा हमला बोलते हुए लिखा था, "यह बहुत दुखद है कि स्वरा जैसी पढ़ी-लिखी महिला को एक ऐतिहासिक फिल्म देखने के बाद केवल अपने शरीर का ख्याल आया। क्या वे इतिहास में महिलाओं पर हुए क्रूर अत्याचारों और युद्धबंदियों की दशा से पूरी तरह अनजान हैं? जौहर कोई नारीवाद की बहस नहीं, एक ऐतिहासिक त्रासदी और वीरता थी।" इसके अतिरिक्त सेंसर बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष प्रसून जोशी और फिल्ममेकर विवेक अग्निहोत्री ने भी स्वरा के इस संकीर्ण नजरिए की कड़ी आलोचना की थी।
आधुनिक नारीवाद बनाम मध्यकालीन यथार्थ: क्यों बेतुकी मानी गई स्वरा भास्कर की दलील?
स्वरा भास्कर की आलोचना के खारिज होने का सबसे बड़ा बौद्धिक कारण यह था कि उन्होंने 14वीं सदी की मध्यकालीन युद्ध क्रूरता की तुलना 21वीं सदी के शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक समाज से कर दी। आधुनिक युग में जहां कानून, पुलिस, अदालतें, मानवाधिकार और पुनर्वास की व्यवस्थाएं हैं, वहां किसी भी प्रकार की आत्महत्या या हिंसा का कोई औचित्य नहीं हो सकता।
किंतु मध्यकाल में जब कोई निर्दयी आक्रांता शहर के शहर जला देता था और हजारों महिलाओं का सामूहिक बलात्कार कर उन्हें गुलाम बना लेता था, तब उन वीरांगनाओं के पास दो ही रास्ते थे—या तो वे झुककर उस दरिंदगी को स्वीकार कर लें, या फिर अपनी मर्जी से अपनी पवित्रता की रक्षा करते हुए अग्नि को समर्पित हो जाएं। चित्तौड़ की माताओं-बहनों ने दूसरा रास्ता चुना। उनके इस साहसिक निर्णय को 'कायरता' या 'पितृसत्ता की देन' कहना ऐतिहासिक वास्तविकताओं से आंखें मूंदने जैसा है।
'पद्मावत' का अमर सिनेमाई जादू: करोड़ों दिलों में आज भी जिंदा है रानी पद्मिनी का बलिदान
संजय लीला भंसाली की 'पद्मावत' ने तमाम विरोधों, राजनीतिक विवादों और आलोचनाओं के बावजूद बॉक्स ऑफिस पर 585 करोड़ रुपये से अधिक का वर्ल्डवाइड कारोबार करके इतिहास रचा था।
दीपिका पादुकोण ने रानी पद्मिनी के रूप में जो गरिमा, तेज और आंखों में अटूट स्वाभिमान प्रस्तुत किया, वह आज भी भारतीय सिनेमा के सबसे शक्तिशाली नारी किरदारों में गिना जाता है। स्वरा भास्कर जैसी हस्तियों के बयानों से न तो भारतीय इतिहास की सच्चाई बदली जा सकती है और न ही रानी पद्मिनी और चित्तौड़ की वीरांगनाओं के अमर बलिदान का कद छोटा किया जा सकता है।
जौहर की वह ज्वाला किसी लाचारी की आग नहीं थी, बल्कि वह सनातन संस्कृति, स्त्री गरिमा और कभी न झुकने वाले अदम्य साहस का ऐसा अमर प्रतीक थी जो युगों-युगों तक देशवासियों के दिलों में आदर और श्रद्धा का भाव जगाती रहेगी।