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October 01 2026 03:57 pm

मृणाल ठाकुर और हुमा कुरैशी की सस्पेंस-थ्रिलर 'पूजा मेरी जान' देखें या नहीं? वीकेंड की वॉचलिस्ट में शामिल....

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ओटीटी की दुनिया में सस्पेंस और साइकोलॉजिकल थ्रिलर का अपना एक अलग दर्शक वर्ग है, जो हर वीकेंड किसी ऐसी कहानी की तलाश में रहता है जो उन्हें अंत तक कुर्सी से बांधे रखे। इसी कड़ी में ओटीटी प्लेटफॉर्म जी5 (ZEE5) पर मृणाल ठाकुर और हुमा कुरैशी अभिनीत बहुचर्चित सस्पेंस-थ्रिलर फिल्म 'पूजा मेरी जान' रिलीज हो चुकी है। निर्देशक नवजोत गुलाटी के निर्देशन में बनी यह फिल्म लगभग चार साल के लंबे इंतजार के बाद दर्शकों के सामने आई है। फिल्म का विषय बेहद संवेदनशील और आधुनिक समाज के उस काले सच को उजागर करता है, जहां प्यार में मिला 'रिजेक्शन' इंसान के ईगो को चोट पहुंचाकर एक खौफनाक मोड़ ले लेता है। अगर आप भी इस वीकेंड रजाई में बैठकर पॉपकॉर्न के साथ इस फिल्म को देखने की योजना बना रहे हैं, तो जान लीजिए कि यह फिल्म आपकी उम्मीदों पर कितनी खरी उतरती है।

क्या है कहानी: रिजेक्शन से उपजा खौफनाक तूफान और कानूनी दांव-पेंच

फिल्म 'पूजा मेरी जान' की पटकथा पूजा (मृणाल ठाकुर) के इर्द-गिर्द घूमती है। कहानी में नाटकीय मोड़ तब आता है जब अनिकेत (विक्रम सिंह चौहान) सबके सामने सरेआम पूजा को शादी के लिए प्रपोज करता है और अंगूठी पहना देता है। हालांकि, पूजा उसके इस प्रपोजल को स्वीकार नहीं करती और उसे ठुकरा देती है। इसके ठीक अगले दिन एक दिल दहला देने वाली खबर सामने आती है कि अनिकेत ने आत्महत्या कर ली है। अनिकेत की मौत के बाद पूरा सामाजिक और कानूनी शिकंजा पूजा के इर्द-गिर्द कसता चला जाता है। उस पर आत्महत्या के लिए उकसाने और साजिश रचने के गंभीर आरोप लगते हैं और उसे सलाखों के पीछे भेज दिया जाता है। कोर्टरूम में पूजा का केस वकील सना (हुमा कुरैशी) लड़ती हैं। इसके बाद शुरू होती है सच, झूठ, समाज के दोहरे मापदंड और परसेप्शन की एक ऐसी कानूनी लड़ाई, जिसमें पूजा को अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ता है।

दमदार विषय लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले: कहां चूक गई फिल्म?

फिल्म का मुख्य विचार (कांसेप्ट) बेहद प्रासंगिक और सोचने पर मजबूर करने वाला है कि कैसे कुछ लोग रिजेक्शन को स्वीकार नहीं कर पाते और उसका नतीजा कितना विनाशकारी हो सकता है। लेकिन एक थ्रिलर के तौर पर फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी इसका स्क्रीनप्ले और धीमा पेस साबित होता है। कहानी में अनिकेत की आत्महत्या जैसा बड़ा टर्निंग पॉइंट जिस साधारण तरीके से दिखाया गया है, वह दर्शकों को वह शुरुआती झटका (शॉक वैल्यू) देने में नाकाम रहता है जिसकी उम्मीद की जाती है। इसके अलावा फिल्म जब कोर्टरूम में दाखिल होती है, तो वहां तीखे संवादों, नए सुरागों और अप्रत्याशित मोड़ों की कमी साफ खलती है। वकीलों की बहस कई जगह बेहद सामान्य और नीरस लगने लगती है, जिससे थ्रिल का स्तर गिर जाता है और दर्शक अनुमान लगाने लगते हैं।

मृणाल और हुमा का शानदार अभिनय: कलाकारों ने संभाली ढीली नैया

कमजोर पटकथा के बावजूद फिल्म अगर देखने लायक बनती है, तो उसकी एकमात्र वजह कलाकारों का उम्दा अभिनय है। पूजा के जटिल, डरे हुए और साथ ही अंदर से मजबूत किरदार में मृणाल ठाकुर ने अपनी अदाकारी की एक नई गहराई दिखाई है। उन्होंने बिना ज्यादा लाउड हुए अपनी आंखों और बॉडी लैंग्वेज से एक फंसी हुई लड़की के दर्द और असमंजस को बखूबी पेश किया है। वहीं, वकील सना के किरदार में हुमा कुरैशी ने हमेशा की तरह अपनी संजीदा स्क्रीन प्रेजेंस से जान फूंक दी है। दोनों अभिनेत्रियों के बीच के सीन प्रभावशाली हैं। विक्रम सिंह चौहान ने भी अपने सीमित रोल में एक जुनूनी प्रेमी के ग्रे शेड्स को ठीक-ठाक निभाया है। फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर और संगीत भी कहानी के माहौल को मजबूती देने में मदद करता है।

अंतिम फैसला: वीकेंड पर देखें या छोड़ें?

रेटिंग: 3 / 5 स्टार्स

देखें या नहीं: अगर आप मृणाल ठाकुर और हुमा कुरैशी की संजीदा अदाकारी के फैन हैं और सामाजिक-मनोवैज्ञानिक मुद्दों पर आधारित ड्रामा देखना पसंद करते हैं, तो यह फिल्म एक बार देखने लायक (One Time Watch) जरूर है। लेकिन अगर आप किसी रोंगटे खड़े कर देने वाले ट्विस्ट, तेज रफ्तार सस्पेंस और 'दृश्यम' या 'बदला' जैसे हाई-ऑक्टेन कोर्टरूम थ्रिलर की उम्मीद कर रहे हैं, तो यह फिल्म आपको थोड़ा निराश कर सकती है।