27 सितंबर से शुरू हो रहा पितृ पक्ष: जानें घर पर श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान की सही विधि
सनातन धर्म में भाद्रपद पूर्णिमा के समापन के साथ ही आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से 16 दिवसीय 'पितृ पक्ष' यानी श्राद्ध महालय का पावन काल आरंभ हो जाता है। इस वर्ष 27 सितंबर से पितृ पक्ष की विधिवत शुरुआत हो रही है, जो 11 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ संपन्न होगा। धर्मग्रंथों और गरुड़ पुराण के अनुसार, ये 16 दिन दिवंगत पूर्वजों, माता-पिता और कुल के पितरों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और सम्मान प्रकट करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण माने गए हैं।
मान्यता है कि पितृ पक्ष के दौरान यमराज सभी जीवात्माओं को अपने परिजनों के पास जाने की अनुमति देते हैं। इस काल में पृथ्वी लोक पर आए पितृ अपने वंशजों से जल, तिल और अन्न की आशा रखते हैं। विधि-विधान से किया गया श्राद्ध और तर्पण पितरों को तृप्ति प्रदान करता है, जिससे वे प्रसन्न होकर वंश वृद्धि, आरोग्य, सुख-शांति और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।
श्राद्ध कर्म का शुभ समय: कुतुप और रोहिणी मुहूर्त
शास्त्रों के अनुसार, श्राद्ध कर्म कभी भी प्रातःकाल, सांध्यकाल या रात्रि के समय नहीं किया जाना चाहिए। पितरों के निमित्त पूजा और तर्पण के लिए दोपहर का समय सर्वोत्तम माना गया है:
कुतुप मुहूर्त: दोपहर 11:45 बजे से 12:35 बजे तक का समय 'कुतुप काल' कहलाता है। यह श्राद्ध की शुरुआत के लिए सबसे उत्तम मुहूर्त है।
रौहिण मुहूर्त: दोपहर 12:35 बजे से 01:25 बजे तक का समय रौहिण मुहूर्त होता है।
अपराह्न काल: दोपहर 01:25 बजे से 03:30 बजे तक का समय तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोजन कराने के लिए सबसे प्रशस्त माना जाता है।
तर्पण की शास्त्रीय विधि: जल, अक्षत और तिल का अर्पण
तर्पण का अर्थ होता है पितरों को जल देकर तृप्त करना। यह कार्य हर व्यक्ति घर पर भी सरलता से कर सकता है:
तैयारी: स्नान के बाद स्वच्छ श्वेत (सफेद) वस्त्र धारण करें। दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें।
कुशा की अंगूठी (पवित्री): दाहिने हाथ की अनामिका (ring finger) में कुशा (घास) की बनी अंगूठी धारण करें। कुशा के अग्रभाग में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु और मूल में भगवान शिव का वास माना जाता है।
सामग्री: एक तांबे या पीतल के पात्र में शुद्ध जल लें। उसमें कच्चा गाय का दूध, गंगाजल, सफेद पुष्प, अक्षत और काले तिल मिलाएं।
जल अर्पण: दोनों हाथों की अंजुलि (हथेलियों) में जल लेकर अंगूठे और तर्जनी के मध्य (पितृ तीर्थ) से तांबे की थाली या भूमि पर अर्पित करें। अपने ज्ञात और अज्ञात पूर्वजों का नाम और गोत्र लेते हुए तीन-तीन बार जल दें और कहें—"तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः, तस्मै स्वधा नमः", अर्थात यह जल मेरे पितरों को तृप्त करे।
पिंडदान कैसे करें?
पिंडदान के माध्यम से पितरों को सूक्ष्म शरीर के पोषण हेतु अन्न अर्पित किया जाता है:
जौ का आटा, पके हुए चावल, गाय का दूध, शहद, घी और काले तिल मिलाकर गोल आकार के पिंड (गोले) तैयार किए जाते हैं।
दक्षिण दिशा में कुश का आसन बिछाकर उन पर पिंड स्थापित किए जाते हैं।
वैदिक मंत्रोच्चार के साथ पितरों का ध्यान करते हुए पिंडों पर रोली, चंदन, फूल और तुलसी दल अर्पित किया जाता है।
श्राद्ध कर्म पूर्ण होने के पश्चात इन पिंडों को बहते हुए पवित्र जल (नदी) में विसर्जित कर दिया जाता है या किसी गाय को आदरपूर्वक खिला दिया जाता है।
पंचबलि का नियम: पांच जीवों को भोजन कराना अनिवार्य
श्राद्ध के दिन ब्राह्मण भोजन से पूर्व 'पंचबलि' यानी पांच जीवों के लिए भोजन का अंश निकालना अनिवार्य नियम है। इनके बिना श्राद्ध अधूरा माना जाता है:
गोबलि (गाय): पत्तल पर पहला भोजन गाय के लिए निकाला जाता है, क्योंकि गाय में समस्त देवी-देवताओं का वास है।
श्वानबलि (कुत्ता): दूसरा भाग यमराज के दूत माने जाने वाले कुत्ते के लिए निकाला जाता है।
काकबलि (कौवा): तीसरा भाग कौवे के लिए छत या खुली जगह पर रखा जाता है। मान्यता है कि कौवे के माध्यम से भोजन सीधे पितरों तक पहुंचता है।
देवादिबलि (देवता): चौथा भाग देवताओं और अग्नि देव को समर्पित किया जाता है।
पिपीलिकादिबलि (चींटी): पांचवां भाग चींटियों और कीट-पतंगों के लिए किसी वृक्ष के समीप या जमीन पर रखा जाता है।
इसके उपरांत किसी योग्य, सात्विक और सदाचारी ब्राह्मण को आदरपूर्वक घर बुलाकर खीर, पूड़ी और सात्विक भोजन कराएं और सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा, वस्त्र व अन्न दान कर उनके चरण स्पर्श करें।
पितृ पक्ष के जरूरी नियम और सावधानियां
सात्विकता का पालन: इन 16 दिनों में घर में पूरी तरह सात्विक माहौल रखें। लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा और तामसिक चीजों का पूर्ण त्याग करें।
इन सब्जियों का परहेज: श्राद्ध के भोजन में चना, मसूर की दाल, सरसों का साग, सत्तू, बैंगन, लौकी और बासी भोजन का प्रयोग वर्जित माना गया है।
संयम और आचरण: पितृ पक्ष के दौरान दाढ़ी, बाल या नाखून काटने से बचना चाहिए। किसी के प्रति कटु वचन न बोलें और ब्रह्मचर्य का पालन करें।
लोहे के बर्तनों का निषेध: पूजा और तर्पण में लोहे या स्टील के बर्तनों के बजाय तांबे, पीतल, चांदी या मिट्टी के पात्रों का ही उपयोग करना चाहिए।
अतिथि और याचक का सत्कार: इन 16 दिनों में द्वार पर आए किसी भी भिक्षुक, निर्धन या पशु को भूखा न लौटाएं; माना जाता है कि पितृ किसी भी रूप में परीक्षा लेने आ सकते हैं।