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October 08 2026 11:42 pm

सर्वपितृ अमावस्या पर इन 5 महादानों से तृप्त होंगे पूर्वज, घर में बरसेगी सुख-समृद्धि और आरोग्य

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भाद्रपद मास की पूर्णिमा से आश्विन मास की अमावस्या तक चलने वाले पितृपक्ष का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण दिन सर्वपितृ अमावस्या कहलाता है। इसे महालया अमावस्या या पितृ मोक्ष अमावस्या भी कहा जाता है। धार्मिक और गरुड़ पुराण की मान्यताओं के अनुसार, इस दिन धरती पर आए सभी पितृ अपने लोक वापस लौटते हैं। यदि किसी व्यक्ति को अपने पूर्वजों की मृत्यु की सटीक तिथि याद न हो, या पूरे पितृपक्ष में श्राद्ध-तर्पण न कर पाया हो, तो केवल सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्रद्धापूर्वक किया गया तर्पण, पिंडदान और दान पूरे कुल को पितृ दोष से मुक्ति दिला देता है। शास्त्रों का स्पष्ट कथन है कि इस दिन किया गया दान सीधे पितरों की सूक्ष्म देह को तृप्त करता है, जिससे वे प्रसन्न होकर अपनी संतानों को दीर्घायु, यश, संतान सुख और अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद देकर विदा होते हैं।

काले तिल और शुद्ध घी: पितरों की मुक्ति का अचूक मार्ग

सर्वपितृ अमावस्या के दिन किए जाने वाले महादानों में काले तिल का स्थान सबसे प्रमुख माना गया है। विष्णु पुराण के अनुसार, तिल की उत्पत्ति स्वयं भगवान श्रीहरि के स्वेद (पसीने) से हुई है, इसलिए काले तिल का स्पर्श और दान नकारात्मक ऊर्जा, प्रेत बाधा और अतृप्त आत्माओं के कष्टों का शमन करता है। इस दिन किसी योग्य ब्राह्मण या जरूरतमंद को कांसे या मिट्टी के पात्र में काले तिल रखकर दान करना चाहिए। इसके साथ ही गाय के शुद्ध देसी घी का दान अत्यंत कल्याणकारी माना गया है। घी का दान करने से पितरों को स्वर्ग लोक में शीतलता और तेज प्राप्त होता है, जिससे साधक के परिवार में आरोग्य का विस्तार होता है और असाध्य रोगों से मुक्ति मिलती है।

अन्न और वस्त्र दान: दरिद्रता निवारण और वंश वृद्धि का उपाय

शास्त्रों में 'अन्नदानं महादानं' कहा गया है, विशेषकर सर्वपितृ अमावस्या के दिन गेहूं, चावल, जौ और दाल जैसे कच्चे अनाजों का 'सीधा' (राशन सामग्री) निकालकर दान करने से घर में कभी अन्न और धन की कमी नहीं होती। यदि संभव हो तो इस दिन पितरों की पसंद का सात्विक भोजन बनाकर ब्राह्मणों, दीन-दुखियों और पांच जीवों (गाय, कुत्ता, कौआ, चींटी और पक्षी) को पंचबलि के रूप में अवश्य खिलाएं। इसके अतिरिक्त, वस्त्र दान का भी विशेष आध्यात्मिक प्रभाव है। पूर्वजों की स्मृति में धोती, गमछा, कुर्ता या सफेद सूती वस्त्र दान करने से पितर अत्यंत प्रसन्न होते हैं। मान्यता है कि वस्त्रहीन अवस्था में भटक रही जीवात्माओं को वस्त्र दान से परम शांति मिलती है और जातक की जन्मकुंडली से गंभीर पितृ दोष समाप्त हो जाता है।

चांदी और भूमि या गुड़ का दान: चंद्र-सूर्य शांति और कुल की रक्षा

ज्योतिष शास्त्र और धर्मग्रंथों में पितरों का संबंध चंद्रमा और सूर्य से बताया गया है, और चांदी को चंद्रमा तथा पितरों की सबसे प्रिय धातु माना जाता है। सर्वपितृ अमावस्या के दिन सामर्थ्यानुसार चांदी का सिक्का, छोटा पात्र या केवल चांदी का एक टुकड़ा दान करने से परिवार में मानसिक तनाव, कलह और अशांति का अंत होता है। यदि चांदी का दान संभव न हो, तो गुड़ और नमक का दान भी अत्यंत फलदायी माना गया है। गुड़ का दान सूर्य को मजबूत करता है और मान-सम्मान दिलाता है, जबकि नमक का दान यमलोक के कष्टों से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। जो श्रद्धालु इस दिन श्रद्धाभाव से यह दान अर्पित करते हैं, उनके कुल में अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है।

दान करते समय कुतुप और रौहिण काल के नियम व सावधानियां

सर्वपितृ अमावस्या पर दान और तर्पण का सर्वोत्तम समय दोपहर का 'कुतुप' और 'रौहिण' मुहूर्त माना जाता है, जो सामान्यतः पूर्वाह्न 11:30 बजे से दोपहर 02:30 बजे के बीच होता है। प्रातःकाल स्नान के बाद दक्षिण दिशा की ओर मुख करके हाथ में जल, कुशा और अक्षत लेकर दान का संकल्प अवश्य लेना चाहिए। बिना संकल्प और बिना श्रद्धा के दिए गए दान का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। ध्यान रहे कि दान सदैव स्वच्छ, बिना उपयोग की गई और सात्विक वस्तुओं का ही करें। दान देते समय मन में किसी प्रकार का अहंकार या दिखावा न हो, केवल पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का भाव होना चाहिए। इस पवित्र दिन सच्चे मन से किए गए ये पांच दान जीवन की समस्त रुकावटों को दूर कर परिवार में खुशहाली और आध्यात्मिक शांति स्थापित करते हैं।