'हमें घर जाना है...', बांग्लादेश के कॉक्स बाजार में रोहिंग्याओं की विशाल रैली; रखाइन वापसी, पूर्ण नागरिकता और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा की मांग
बांग्लादेश के दक्षिण-पूर्वी सीमावर्ती जिले कॉक्स बाजार स्थित दुनिया के सबसे बड़े शरणार्थी शिविरों में एक बार फिर अपने वतन वापसी की गूंज सुनाई दी है। कुतुपलोंग, उखिया, बालूखाली और टेकनाफ के विभिन्न शरणार्थी कैंपों से निकलकर हजारों की संख्या में रोहिंग्या शरणार्थी सड़कों और खुले मैदानों में एकत्र हुए। हाथों में 'गो होम' (Go Home), 'वी वांट जस्टिस' (We Want Justice) और 'होप इज होम' की तख्तियां लिए पुरुषों, महिलाओं और युवाओं ने एक सुर में म्यांमार के रखाइन राज्य (अराकान) लौटने की पुरजोर मांग उठाई। शरणार्थियों का कहना है कि वे बांग्लादेश में हमेशा के लिए एक लाचार शरणार्थी बनकर नहीं जीना चाहते, बल्कि अपनी उस पुश्तैनी जमीन पर स्वाभिमान के साथ लौटना चाहते हैं जिसे वे सदियों से अपना घर मानते आए हैं।
'क्या हमें अगले 50 साल तक यहीं रहना होगा?': रोहिंग्या नेताओं का झकझोरने वाला सवाल
रैली के दौरान रोहिंग्या समुदाय के प्रमुख नेताओं ने शरणार्थी जीवन की अनिश्चितता और विवशता पर गहरा दर्द बयां किया। रोहिंग्या शरणार्थी नेता सैयद उल्लाह ने सभा को संबोधित करते हुए भावुक अंदाज में कहा, "चाहे म्यांमार की सैन्य जुंटा हो या फिर विद्रोही अराकान आर्मी, जब तक वे अपनी सत्ता और वर्चस्व का दोहरा खेल जारी रखेंगे, तब तक रखाइन में शांति संभव नहीं होगी। क्या इसका यह मतलब निकाला जाए कि हमें अगले 50 वर्षों तक बांग्लादेश के इन संकरे कैंपों में ही कैद रहना होगा? हम 50 साल तक यहां नहीं रह सकते। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह तय करना ही होगा कि अराकान में शांति और हमारी सुरक्षित वापसी का अनुकूल माहौल कैसे बने।" नेताओं ने दोहराया कि सालों से तिरपाल और बांस की झोपड़ियों में कट रही जिंदगी अब उनके धैर्य की अंतिम सीमा को छू चुकी है।
रखाइन में अराकान आर्मी और जुंटा सेना के बीच जंग, फिर भी वतन वापसी की जिद
म्यांमार का रखाइन प्रांत इस समय अत्यंत जटिल सुरक्षा और राजनीतिक संकट के दौर से गुजर रहा है। म्यांमार की सत्ताधारी सेना (जुंटा) और स्थानीय जातीय विद्रोही गुट 'अराकान आर्मी' (Arakan Army) के बीच छिड़े भीषण गृहयुद्ध के चलते क्षेत्र में भारी अस्थिरता बनी हुई है। कई शहरों और सीमावर्ती चौकियों पर विद्रोही गुटों ने नियंत्रण स्थापित कर लिया है। इसके बावजूद, शरणार्थी कैंपों में रह रहे रोहिंग्याओं का मानना है कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, उनका वास्तविक समाधान केवल अपनी मातृभूमि में ही संभव है। वे किसी तीसरे देश में पुनर्वास के बजाय अपने मूल गांवों और खेतों में वापस जाने को अपनी पहली और अंतिम प्राथमिकता बता रहे हैं।
नागरिकता, पहचान और जमीन की बहाली: शरणार्थियों की मुख्य मांगें
इस विशाल प्रदर्शन के दौरान शरणार्थी प्रतिनिधियों ने संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक शक्तियों के सामने अपनी प्रमुख मांगें रखीं। उनकी सबसे पहली और बुनियादी मांग म्यांमार के विवादित 1982 के नागरिकता कानून को रद्द करने की है, जिसने दशकों पहले रोहिंग्या समुदाय को उनकी ही जमीन पर राज्यविहीन (Stateless) बना दिया था। इसके साथ ही, उन्होंने मांग की है कि म्यांमार सरकार उन्हें 'बंगाली' या 'अवैध प्रवासी' कहना बंद करे और आधिकारिक तौर पर 'रोहिंग्या' के रूप में मान्यता दे। इसके अतिरिक्त, 2017 की सैन्य कार्रवाई के दौरान छीनी गई जमीनों, तबाह किए गए घरों और संपत्तियों की पूर्ण वापसी तथा अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा बलों की निगरानी में सुरक्षित आवागमन की गारंटी देने की मांग भी प्रमुखता से उठाई गई।
बांग्लादेश पर बढ़ता आर्थिक व सामाजिक बोझ और घटती अंतरराष्ट्रीय मदद
बांग्लादेश में वर्तमान में 12 लाख से अधिक रोहिंग्या शरणार्थी बेहद सीमित संसाधनों के बीच जीवन यापन कर रहे हैं। बांग्लादेश सरकार और स्थानीय प्रशासन के लिए इतने विशाल मानवीय संकट को संभालना एक भारी आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय चुनौती बन चुका है। कॉक्स बाजार के आसपास के जंगल और प्राकृतिक संसाधन गंभीर रूप से प्रभावित हुए हैं। वहीं दूसरी तरफ, वैश्विक स्तर पर अन्य युद्धों और भू-राजनीतिक तनावों के कारण रोहिंग्या राहत कोष में अंतरराष्ट्रीय दाताओं की ओर से मिलने वाली वित्तीय मदद और राशन में लगातार कटौती देखी गई है। खाद्य सामग्री और बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी ने कैंपों के भीतर कुपोषण और बीमारियों के खतरे को और बढ़ा दिया है।
सम्मानजनक समाधान के लिए ठोस वैश्विक हस्तक्षेप की दरकार
रोहिंग्या समुदाय का यह विशाल शक्ति प्रदर्शन इस बात का स्पष्ट संदेश है कि शरणार्थी संकट को केवल मानवीय राहत और राशन के पैकेटों तक सीमित रखकर नहीं सुलझाया जा सकता। जब तक संयुक्त राष्ट्र, आसियान (ASEAN) और वैश्विक महाशक्तियां म्यांमार प्रशासन और वहां के क्षेत्रीय हितधारकों पर ठोस कूटनीतिक दबाव नहीं बनातीं, तब तक इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। बांग्लादेश में आयोजित इस रैली ने एक बार फिर पूरी दुनिया का ध्यान इस ओर खींचा है कि लाखों विस्थापित इंसान आज भी न्याय, पहचान और अपने वतन लौटने के बुनियादी मानवाधिकार की बाट जोह रहे हैं।