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September 24 2026 09:25 pm

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर अवमानना का शिकंजा: वकील ने अटॉर्नी जनरल से मांगी केस चलाने की मंजूरी

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देश के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और संवैधानिक मर्यादाओं की कथित अवमानना को लेकर शीर्ष अदालत के एक अधिवक्ता ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कानूनी मोर्चा खोल दिया है। वकील ने भारत के अटॉर्नी जनरल (AG) आर. वेंकटरमणी को औपचारिक पत्र लिखकर ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) का मुकदमा शुरू करने की वैधानिक मंजूरी मांगी है।

अधिवक्ता का आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के भीतर दोनों साथी चुनाव आयुक्तों को दरकिनार करते हुए मनमाने फैसले लिए, जो सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व में दिए गए ऐतिहासिक फैसलों और संविधान के अनुच्छेद 141 का खुला उल्लंघन है।

अटॉर्नी जनरल से क्यों मांगी गई मंजूरी? समझें कानूनी प्रक्रिया

कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट्स एक्ट, 1971 (न्यायालय अवमानना अधिनियम) की धारा 15(1)(b) के तहत यह अनिवार्य कानूनी प्रावधान है कि सुप्रीम कोर्ट में किसी भी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक अवमानना याचिका दाखिल करने से पहले भारत के अटॉर्नी जनरल की लिखित सहमति लेना आवश्यक होता है।

अधिवक्ता ब्रजेश सिंह ने सुप्रीम कोर्ट अवमानना नियम, 1975 के नियम 3 के तहत अटॉर्नी जनरल को याचिका भेजकर यह औपचारिक अनापत्ति (Nod) मांगी है। अटॉर्नी जनरल की हरी झंडी मिलते ही सुप्रीम कोर्ट में आधिकारिक अवमानना याचिका दायर की जा सकेगी।

क्या हैं आरोप? 'टी.एन. शेषन' और 'अनूप बरनवाल' फैसलों की अनदेखी

वकील द्वारा दी गई अर्जी में सुप्रीम कोर्ट की दो ऐतिहासिक नज़ीरों का मुख्य रूप से हवाला दिया गया है:

टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ केस: इस ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने स्पष्ट व्यवस्था दी थी कि निर्वाचन आयोग एक 'बहु-सदस्यीय संस्था' (Multi-member Commission) है। इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त कोई सर्वोच्च या निरंकुश अधिकारी नहीं, बल्कि 'समानों में प्रथम' (Primus inter pares) होते हैं। अदालत ने साफ कहा था कि कोई भी सीईसी "संस्था से बड़ा या अधिक शक्तिशाली" नहीं हो सकता और आयोग के फैसले पूरी बॉडी के फैसले होते हैं, न कि अकेले अध्यक्ष के।

अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023): इस फैसले में अदालत ने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए चुनाव आयोग की निष्पक्षता और संस्थागत स्वायत्तता पर जोर दिया था।

अर्जी में आरोप लगाया गया है कि दोनों चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना "फुल कमीशन" के नाम पर सार्वजनिक निर्देश और आदेश जारी करना सुप्रीम कोर्ट के कानूनी आदेशों की जानबूझकर अवहेलना है। इसे एक स्वतंत्र बहु-सदस्यीय संस्था को 'वन-मैन ऑटोक्रेसी' (एक व्यक्ति की तानाशाही) में बदलने जैसा कदम बताया गया है।

आंतरिक मतभेदों के खुलासे के बाद गरमाया मामला

यह कानूनी विवाद मीडिया रिपोर्ट्स के उन खुलासों के बाद भड़का है, जिसमें दावा किया गया था कि चुनाव आयोग के भीतर गंभीर आंतरिक टकराव चल रहा है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार औपचारिक और लिखित आपत्तियां दर्ज कराई थीं।

ये आपत्तियां कथित तौर पर फॉर्म 6 (वोटर रजिस्ट्रेशन) में बदलाव, मतदाता सूची से नाम जोड़ने-हटाने की प्रक्रिया और वोटर डेटाबेस तक एक्सेस को केंद्रीयकृत करने जैसे संवेदनशील फैसलों को लेकर थीं।

आयुक्तों ने कुछ फैसलों को अपनी जानकारी और मंजूरी के बिना लिया गया 'अनधिकृत' तक करार दिया था।

चुनाव आयोग का रुख: आंतरिक विमर्श का हिस्सा

वहीं दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग ने आयोग में किसी भी तरह के विभाजन या मनमानी के आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है। आयोग का कहना है कि किसी भी संवैधानिक संस्था में अंतिम निर्णय तक पहुंचने से पहले अलग-अलग राय, आपत्तियां और विचार-विमर्श एक सामान्य और स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं, और आयोग के अंतिम फैसले सर्वसम्मति से ही लिए जाते हैं।

अब सबकी नजरें अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी के फैसले पर टिकी हैं कि क्या वे देश के मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में आपराधिक अवमानना केस चलाने की अनुमति देते हैं या नहीं।