जीवित्पुत्रिका व्रत आज: कथा के बाद जरूर धारण करें 'जिउतिया सूत्र', जानें कल पारण का सही समय और परंपरा
सनातन परंपरा में संतान के दीर्घायु, आरोग्य और उज्ज्वल भविष्य की मंगलकामना के लिए रखा जाने वाला जीवित्पुत्रिका यानी जितिया व्रत आज अत्यंत श्रद्धा, नियम और निष्ठा के साथ रखा जा रहा है। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर पड़ने वाला यह पावन पर्व माताओं की अगाध ममता और कठोर तपस्या का जीवंत प्रमाण है। 24 घंटे से भी अधिक समय तक चलने वाले इस कठिन निर्जला उपवास में माताएं अन्न और जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं करती हैं। उत्तर भारत के पारंपरिक अंचलों, विशेषकर बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में आज घर-घर में उत्सव और भक्ति का माहौल है। आज पूरे दिन के निर्जला संयम के बाद सायंकाल पूजा-अर्चना और कथा श्रवण का सबसे प्रमुख विधान पूरा किया जाएगा।
आज जीवित्पुत्रिका पूजन: कैसे करें पूजा और कथा श्रवण
जितिया व्रत की पूजा का विधान प्रकृति और पौराणिक आस्था के गहरे सामंजस्य पर आधारित है। आज सायंकाल के समय व्रती महिलाएं स्वच्छ वस्त्र धारण कर आंगन या पूजा कक्ष में पवित्र वेदी तैयार करती हैं। गोबर या स्वच्छ मिट्टी से लीपकर एक छोटा सा प्रतीकात्मक जलाशय (तालाब) बनाया जाता है, जिसके तट पर पाकड़ या बरगद की हरी डाल रोपी जाती है। कुश (पवित्र घास) की सहायता से धर्मात्मा गंधर्व राजकुमार जीमूतवाहन की प्रतिमा स्थापित की जाती है। इसके साथ ही जलाशय के पास मिट्टी से चील्ह (चील) और सियारिन (लोमड़ी) की आकृतियां बनाई जाती हैं और उन पर सिंदूर, अक्षत और पुष्प अर्पित किए जाते हैं।
पूजा सामग्री में सरसों का तेल, खली, नोनी का साग, मरुवा का आटा, बांस के पत्ते, तोरी (झिंगी) के फूल, कच्चा धागा और खीरा विशेष रूप से अर्पित किया जाता है। महिलाएं समूह में बैठकर राजा जीमूतवाहन के महान आत्मबलिदान, पक्षीराज गरुड़ द्वारा दिए गए अभयदान, चील्ह-सियारिन की निष्ठा और महाभारत काल में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा उत्तरा के गर्भ में पल रहे परीक्षित को दिए गए जीवनदान की कथा का भक्तिभाव से श्रवण करती हैं।
कथा के बाद 'जिउतिया सूत्र' पहनने का विशेष महत्व और नियम
जीवित्पुत्रिका व्रत की संपूर्ण पूजा और कथा श्रवण के उपरांत सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान 'जिउतिया सूत्र' (जिसे जितिया डोरा या लाल धागा भी कहा जाता है) को धारण करना माना जाता है। शास्त्रों और लोक परंपराओं में इस सूत्र को संतान के लिए साक्षात सुरक्षा कवच का दर्जा दिया गया है।
सूत्र तैयार करने की विधि: यह सूत्र लाल या पीले रंग के सूती या रेशमी धागे से बनाया जाता है, जिसमें गांठें लगाई जाती हैं। कई परिवारों में चांदी या सोने के बने जीमूतवाहन लॉकेट को इस लाल धागे में पिरोया जाता है।
पूजन में अर्पण: कथा शुरू होने से पहले इस सूत्र को पूजा की थाली में रखकर अक्षत, रोली, चंदन और सिंदूर से अभिमंत्रित किया जाता है और भगवान जीमूतवाहन के चरणों में अर्पित किया जाता है।
धारण करने की परंपरा: कथा समाप्त होने और आरती के पश्चात व्रती माताएं इस पवित्र धागे को अपने गले में धारण करती हैं। कई क्षेत्रों में माताओं के साथ-साथ यह रक्षा सूत्र संतान की कलाई या गले में भी बांधा जाता है। मान्यता है कि अभिमंत्रित जिउतिया सूत्र धारण करने से संतान के ऊपर आने वाली अकाल मृत्यु, नजर दोष, गंभीर रोग और समस्त संकटों का नाश स्वयं सुदर्शन चक्रधारी भगवान श्रीकृष्ण और राजा जीमूतवाहन करते हैं।
कल पारण कब और किस समय होगा?
जितिया व्रत के नियम अत्यंत कड़े और शास्त्रोक्त होते हैं। इस व्रत का समापन यानी पारण अष्टमी तिथि के पूर्ण होने और नवमी तिथि के आगमन पर सूर्योदय के बाद ही किया जाता है।
पारण की तिथि: कल, आश्विन कृष्ण नवमी तिथि (रविवार)।
पारण का शुभ समय: कल प्रातः सूर्योदय के तुरंत बाद से लेकर पूर्वाहन काल तक पारण का सर्वोत्तम समय रहेगा। प्रातः 06:15 बजे से लेकर 08:30 बजे के बीच पारण करना सर्वाधिक शास्त्रसम्मत और पुण्यदायी माना गया है।
पारण की पारंपरिक विधि: कल सुबह जल्दी उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर सबसे पहले भगवान सूर्य नारायण को अर्घ्य दिया जाता है और कुलदेवता तथा जीमूतवाहन का ध्यान किया जाता है।
पारण में क्या ग्रहण करें: जितिया व्रत का पारण पारंपरिक रूप से नोनी का साग, मरुवा की रोटी, तोरी या कंदा की सब्जी और खीरा खाकर ही खोला जाता है। मान्यता है कि नोनी के साग में भरपूर पोषण और औषधीय गुण होते हैं, जो 24 घंटे के निर्जला उपवास के बाद शरीर को तुरंत नई ऊर्जा और संतुलन प्रदान करते हैं।
पारण से पूर्व इन बातों का रखें विशेष ध्यान
व्रत खोलने से पूर्व घर के बड़े-बुजुर्गों का चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें। पारण के भोजन की पहली थाली या ग्रास गाय, कौवे और जरूरतमंदों के लिए निकालना अत्यंत आवश्यक माना गया है। किसी योग्य ब्राह्मण या जरूरतमंद को सीधा (अनाज, दाल, नमक, तेल) और सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा देकर ही स्वयं अन्न-जल ग्रहण करना चाहिए। इस प्रकार पूर्ण श्रद्धा और विधिपूर्वक संपन्न किया गया यह व्रत संतान को शतायु, आरोग्यवान और हर क्षेत्र में विजयी बनाता है।