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September 09 2026 04:01 am

नेपाल में प्रलयंकारी सैलाब से हाहाकार: मरने वालों का आंकड़ा 1,003 पहुंचा

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नेपाल और तिब्बत के उच्च हिमालयी सीमावर्ती क्षेत्र में अचानक आई प्रलयंकारी बाढ़ ने आधुनिक इतिहास की सबसे दर्दनाक मानवीय त्रासदियों में से एक को जन्म दिया है। नेपाल के राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण और प्रबंधन प्राधिकरण (NDRRMA) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, सैलाब और मलबे की चपेट में आने से जान गंवाने वाले लोगों की संख्या बढ़कर 1,003 हो गई है।

इस भयावह आपदा की शुरुआत 26 अगस्त को हुई थी, जब लांगटांग हिमाल और नेपाल-तिब्बत सीमा के निकट ऊंचे ग्लेशियर का एक विशाल हिस्सा टूटकर ल्हेन्डे खोला और भोटेकोशी नदी के जलग्रहण क्षेत्र में जा गिरा। इसके बाद बर्फ, विशालकाय चट्टानों और मलबे के साथ उतरे उफनते पानी ने रास्ते में आने वाले गांवों, कस्बों, पुलों, सड़कों और बुनियादी ढांचों को पूरी तरह जमींदोज कर दिया। राहत और बचाव दल जैसे-जैसे दुर्गम पहाड़ी ढलानों, दलदल और मलबे को हटा रहे हैं, वैसे-वैसे शवों के मिलने का सिलसिला बढ़ता जा रहा है, जिससे पूरा देश गहरे सदमे में है।

8 जिलों में बिखरा मौत का मंजर: चितवन और नवलपरासी में सबसे ज्यादा लाशें बरामद

प्रशासनिक आंकड़ों के अनुसार, इस जलप्रलय का असर नेपाल के 8 प्रमुख जिलों में सबसे घातक रहा है। भोटेकोशी और त्रिशूली नदी प्रणालियों के उफान पर होने के कारण बहाव की दिशा में पड़ने वाले निचले तराई और मध्य-पहाड़ी जिलों में लाशों का अंबार लग गया।

सुरक्षा बलों द्वारा जारी जिलावार आंकड़ों के मुताबिक, सबसे ज्यादा 321 शव अकेले चितवन जिले से बरामद किए गए हैं। इसके बाद नवलपरासी पूर्व में 216 और नवलपरासी पश्चिम में 170 शव निकाले जा चुके हैं। पहाड़ी जिले नुवाकोट में 95, गोरखा में 65, धाडिंग में 57, रसुवा में 41 और तनहुन में 38 शवों को अब तक मलबे और नदियों के किनारों से बाहर निकाला गया है। बाढ़ का बहाव इतना तेज था कि सैकड़ों शव बहकर भारत के सीमावर्ती उत्तर प्रदेश और बिहार के मैदानी इलाकों तक पहुंच गए, जहां से स्थानीय पुलिस शवों को बरामद कर उनकी शिनाख्त करने की कोशिश कर रही है।

4,000 लोग अभी भी लापता: हाइड्रोपावर सुरंगों में फंसे सैकड़ों मजदूरों की तलाश

आपदा के सातवें दिन भी करीब 4,000 लोग आधिकारिक तौर पर लापता दर्ज हैं। नेपाल के ऊर्जा क्षेत्र को इस सैलाब ने सबसे करारी चोट पहुंचाई है। रसुवा और नुवाकोट जिलों में भोटेकोशी और त्रिशूली नदियों पर बनी कम से कम 12 प्रमुख जलविद्युत (हाइड्रोपावर) परियोजनाएं पूरी तरह मलबे और गाद में समा चुकी हैं।

निजी क्षेत्र के पावर डेवलपर्स के अनुसार, इन हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स में काम करने वाले लगभग 900 कर्मचारी लापता हैं, जिनमें से 500 से अधिक श्रमिकों के पानी और कीचड़ से भरी भूमिगत सुरंगों (टनेल्स) के भीतर फंसे होने की आशंका है। नेपाल सेना, सशस्त्र पुलिस बल और स्निफर डॉग्स की टीमें भारी मशीनरी के जरिए सुरंगों से गाद निकालने में दिन-रात जुटी हैं। हालांकि, सुरंगों में ऑक्सीजन की भारी कमी और लगातार जमा हो रहे मलबे के कारण अंदर फंसे लोगों के जीवित बचने की उम्मीदें समय बीतने के साथ बेहद धुंधली होती जा रही हैं।

विदेशी पर्यटकों और सैकड़ों भारतीय नागरिकों की तलाश में जुटा अंतरराष्ट्रीय तंत्र

नेपाल में यह समय ट्रैकिंग और पर्यटन का प्रमुख सीजन माना जाता है, जिसके चलते आपदा के वक्त बड़ी संख्या में विदेशी नागरिक और भारतीय श्रद्धालु पहाड़ी रास्तों पर मौजूद थे। लापता लोगों में 30 से अधिक देशों के लगभग 583 विदेशी नागरिक शामिल हैं।

लापता विदेशियों में सबसे बड़ी संख्या भारतीय नागरिकों की है। भारत के विदेश मंत्रालय और काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास के अनुसार, 275 भारतीय नागरिक और 128 भारतीय मूल के लोग अब भी लापता हैं। इसके अतिरिक्त अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, यूक्रेन और मलेशिया के दर्जनों नागरिक भी बाढ़ प्रभावित रूटों से गायब हैं। भारत सरकार ने नेपाल के साथ मिलकर लापता भारतीयों की तलाश और राहत सामग्री पहुंचाने के लिए 24x7 कंट्रोल रूम सक्रिय किया है और एनडीआरएफ की विशेषज्ञ टीमों को स्टैंडबाय पर रखा गया है।

12 हजार जिंदगियां बचाईं, 16 हेलिकॉप्टरों से दुर्गम घाटियों में एयरलिफ्ट जारी

इस अभूतपूर्व विनाश के बीच राहत दलों ने अदम्य साहस दिखाते हुए अब तक 12,000 से अधिक लोगों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया है। देश के दुर्गम पहाड़ी इलाकों में जहां सड़कें पूरी तरह कट चुकी हैं और पुल बह गए हैं, वहां नेपाल सेना और निजी कंपनियों के 16 हेलिकॉप्टरों के जरिए व्यापक एयरलिफ्ट अभियान चलाया जा रहा है।

आपदा प्रबंधन अधिकारियों ने बताया कि बाढ़ से विस्थापित हुए 3,000 से अधिक लोगों को विभिन्न अस्थायी राहत शिविरों, स्कूलों और सामुदायिक भवनों में ठहराया गया है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में 65,000 से अधिक लोगों को तत्काल पीने के साफ पानी, दवाओं और स्वच्छता किट की सख्त जरूरत है। महामारी के खतरे को देखते हुए डॉक्टरों की मोबाइल टीमें कैंपों में तैनात की गई हैं।

दोबारा बाढ़ का नया अलर्ट और जलवायु परिवर्तन का गंभीर सबक

त्रिभुवन यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर डिजास्टर स्टडीज के विशेषज्ञों ने इस आपदा को हिमालय में जलवायु परिवर्तन, टेक्टोनिक हलचल और अनियंत्रित निर्माण गतिविधियों का घातक परिणाम बताया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि उच्च हिमालयी क्षेत्रों में तापमान बढ़ने से ग्लेशियल झीलों का फटना और एवलांच की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं।

इस बीच, नेपाल के मौसम विज्ञान विभाग और आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDRRMA) ने देश के पूर्वी, मध्य और पश्चिमी हिस्सों में मूसलाधार बारिश के चलते बाढ़ का नया अलर्ट जारी किया है। गोरखा, लमजुंग, डोल्पा, दार्चुला और कैलाली सहित दर्जनों जिलों के नदी तटीय इलाकों में रहने वाले नागरिकों को तुरंत सुरक्षित ऊंचे स्थानों पर जाने की अपील की गई है। सेना और पुलिस के 8,000 से अधिक जवानों का दल मलबे में दबी जिंदगियों को बचाने के लिए समय के खिलाफ जंग लड़ रहा है।