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October 01 2026 03:57 pm

'Drishyam 3' देखने की तैयारी? थिएटर्स जाने से पहले फटाफट रीकैप करें पार्ट 1 और 2 की पूरी सस्पेंस गाथा!

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भारतीय सिनेमाई पर्दे पर जब भी दिमाग, परिवार की हिफाजत और सस्पेंस का मुकाबला होता है, तो सबसे पहला नाम विजय सालगांवकर का आता है। फिल्म निर्माता और निर्देशक जिस तरह से इस फ्रेंचाइजी को आगे बढ़ा रहे हैं, उसने हर सिनेमा प्रेमी को इस कहानी का दीवाना बना दिया है। अब जब 'दृश्यम 3' टिकट काउंटरों पर दस्तक दे चुकी है और लोग एडवांस बुकिंग में टिकट बुक करने की होड़ में लगे हैं, तो थिएटर की कुर्सी पर बैठने से पहले पिछली दोनों कड़ियों की कहानी को ताजा करना बेहद जरूरी हो जाता है। 2 और 3 अक्टूबर की वो तारीखें, पणजी का स्वामी चिन्मयानंद का सत्संग, होटल में पाव भाजी और एक चौथी पास केबल ऑपरेटर का पुलिस तंत्र को मात देने का शातिर दिमाग—ये सब कुछ ऐसा है जिसे रीकैप किए बिना तीसरे पार्ट का असली मजा नहीं लिया जा सकता।

दृश्यम पार्ट 1: एक अनजाने गुनाह से शुरू हुआ 2 और 3 अक्टूबर का अमर चक्रव्यूह

साल 2015 में रिलीज हुई पहली 'दृश्यम' की शुरुआत गोवा के एक शांत कस्बे पोंडा से होती है, जहां विजय सालगांवकर (अजय देवगन) अपनी पत्नी नंदिनी (श्रिया सरन) और दो बेटियों अंजू व अन्नू के साथ एक साधारण जिंदगी बिता रहा होता है। विजय को फिल्में देखने का बेइंतहा शौक है और वह सिनेमा की बारीकियों से इंसानी मनोविज्ञान को समझता है। कहानी में भूचाल तब आता है जब गोवा पुलिस की आईजी मीरा देशमुख (तब्बू) का बिगड़ैल बेटा सैम एक नेचर कैंप के दौरान विजय की बड़ी बेटी अंजू का आपत्तिजनक एमएमएस बना लेता है और उसे ब्लैकमेल करते हुए रात के अंधेरे में उसके घर पहुंचता है।

घर के गैराज में छींटाकशी और हाथापाई के दौरान अपनी मां और बहन की रक्षा करते हुए गलती से अंजू के हाथ से सैम के सिर पर वार हो जाता है और उसकी मौके पर ही मौत हो जाती है। जब विजय घर लौटता है, तो अपराध स्वीकार करने के बजाय अपने मासूम परिवार को जेल की सलाखों से बचाने का बीड़ा उठाता है। यहीं से शुरू होता है उसका सिनेमाई दिमाग। विजय सैम की लाश को निर्माणाधीन पोंडा पुलिस स्टेशन की नींव में दफना देता है—एक ऐसी जगह जहां किसी का शक कभी नहीं जा सकता। इसके बाद वह पूरे परिवार के साथ 2 और 3 अक्टूबर को पणजी जाने का एक ऐसा मजबूत 'अलिबाई' (बहाना) तैयार करता है, जिसमें होटल के बिल, बस की टिकटें, एटीएम ट्रांजेक्शन और सत्संग के गवाह शामिल होते हैं। आईजी मीरा देशमुख पूरी ताकत झोंक देती हैं, विजय और उसके परिवार को थर्ड डिग्री टॉर्चर से गुजरना पड़ता है, लेकिन कोई सुबूत नहीं मिलता। विजय हर सवाल का वही सधा हुआ जवाब देता है और अंततः पुलिस को बिना किसी लाश या सुबूत के उसे छोड़ना पड़ता है।

दृश्यम पार्ट 2: सात साल बाद फिर उठा सैम का कंकाल और विजय का अगला मास्टरस्ट्रोक

नवंबर 2022 में आई 'दृश्यम 2' की कहानी पहले भाग के सात साल बाद के घटनाक्रम को दिखाती है। विजय अब सिर्फ केबल ऑपरेटर नहीं रहा, बल्कि वह एक मूवी थिएटर का मालिक बन चुका है और अपनी जिंदगी पर एक फीचर फिल्म बनाने के लिए एक मशहूर लेखक के साथ स्क्रिप्ट पर काम कर रहा है। हालांकि, समाज के ताने और पुलिस के डर ने उसके परिवार को अंदर से ट्रॉमा में डाल रखा है। इस बीच कस्बे में एक नया और बेहद शातिर आईजी तरुण अहलावत (अक्षय खन्ना) आता है, जो मीरा देशमुख के साथ मिलकर केस की फाइल दोबारा खोलता है।

पुलिस पूरी योजना के तहत विजय के घर के आसपास अपने जासूसों को पड़ोसी बनाकर तैनात करती है और एक चश्मदीद गवाह की मदद से आखिरकार उसी पुलिस थाने के फर्श को खोदकर सैम के कंकाल के अवशेष बरामद कर लेती है। ऐसा लगता है कि अब विजय का खेल पूरी तरह खत्म हो चुका है और वह कानूनी शिकंजे में फंस चुका है। लेकिन क्लाइमेक्स में विजय सालगांवकर एक ऐसा पासा फेंकता है जो पुलिस के पैरों तले जमीन खिसका देता है। विजय ने अपनी फिल्म स्क्रिप्ट के बहाने पहले से ही कोर्ट रूम और फॉरेंसिक लैब की कार्यप्रणाली का अध्ययन कर लिया था। उसने कब्रिस्तान के एक चौकीदार को पैसे देकर सैम की ही उम्र के एक अन्य अज्ञात युवक के कंकाल का इंतजाम कर लिया था। जब पुलिस ने अवशेष डीएनए जांच के लिए लैब भेजे, तो विजय ने अपनी चालाकी से जांच अधिकारी को रिश्वत देकर सैंपल ही बदलवा दिया। जब कोर्ट में फॉरेंसिक रिपोर्ट आई, तो हड्डियों का डीएनए सैम के माता-पिता से मैच ही नहीं हुआ। जज के सामने पुलिस की फजीहत हुई और विजय एक बार फिर कानून के सामने बेगुनाह साबित होकर अपने परिवार को सुरक्षित बाहर निकाल लाया। अंत में वह मीरा और उनके पति को सैम की अस्थियां सौंपते हुए कहता है कि वह केवल अपने परिवार की रक्षा करना चाहता था।

अब 'दृश्यम 3' में क्या होगा? टिकट बुक करने से पहले इन सवालों पर रखें नजर

'दृश्यम 3' को इस फ्रेंचाइजी का अंतिम और सबसे निर्णायक अध्याय बताया जा रहा है। जहां पार्ट 1 अपराध को छिपाने के बारे में था और पार्ट 2 कानून की पकड़ से बचने की रणनीति था, वहीं पार्ट 3 को लेकर चर्चा है कि इस बार पुलिस तंत्र विजय सालगांवकर के खिलाफ कोई कागजी कार्रवाई नहीं बल्कि मनोवैज्ञानिक युद्ध छेड़ेगा। क्या सात साल पहले बंद हुई फाइलें हमेशा के लिए दफन रहेंगी या विजय का कोई पुराना साथी ही उसके राज से पर्दा उठा देगा? क्या इस बार कानून विजय के दिमाग को मात दे पाएगा या विजय अपने परिवार को हमेशा के लिए इस दलदल से आजाद कर देगा? अगर आप थिएटर्स में इस माइंड-गेम का गवाह बनने जा रहे हैं, तो इन दोनों भागों की बारीकियों को याद रखना आपको फिल्म की हर एक चाल को गहराई से समझने में मदद करेगा।