सहकारिता से डिप्टी सीएम तक: जानिए कौन थे अजित पवार, जिनके हाथ में हमेशा रहा महाराष्ट्र की 'पावर'

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India News Live,Digital Desk : महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार का बुधवार सुबह पुणे जिले के बारामती इलाके में प्लेन क्रैश में निधन हो गया। उनके साथ इस हादसे में तीन अन्य लोगों की भी मौत हुई। बीते एक दशक में अजित पवार राज्य की राजनीति में एक ऐसा नाम बने, जिन्होंने महाराष्ट्र की सत्ता पर गहरा प्रभाव रखा।

अजित पवार का प्रारंभिक जीवन और राजनीति में प्रवेश
अजित पवार का जन्म 22 जुलाई 1959 को हुआ। वे राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के संस्थापक शरद पवार के भतीजे थे। राजनीति में कदम रखने से पहले वे लंबे समय तक सहकारिता आंदोलन से जुड़े रहे, जिसे महाराष्ट्र की राजनीति की रीढ़ माना जाता है।

23 साल की उम्र में ही उन्होंने राजनीति में कदम रखा और कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्री के बोर्ड में सदस्य बने। 1991 में वे पुणे सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक के अध्यक्ष बने और 16 साल तक इस पद पर रहे। उसी साल उन्होंने पहली बार संसदीय चुनाव भी जीता।

बारामती से राज्य स्तर तक का सफर
1995 में अजित पवार ने बारामती सीट से विधानसभा चुनाव जीता और इसे अपनी राजनीतिक मजबूत स्थिति का केंद्र बना लिया। इसी सीट से उन्होंने लगातार 7 बार जीत दर्ज की। 2010 में वे पहली बार महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री बने और इसके बाद अलग-अलग सरकारों में इस पद पर कई बार कार्य किया।

उपमुख्यमंत्री रहते हुए उनके पास वित्त, सिंचाई और जल संसाधन जैसे महत्वपूर्ण विभाग रहे। इन विभागों के माध्यम से वे राज्य के प्रशासनिक और बजट संबंधी फैसलों में सीधे तौर पर शामिल रहे।

शरद पवार के साथ राजनीतिक गुरु-शिष्य का रिश्ता
अजित पवार ने राजनीति की शुरुआती ट्रेनिंग अपने चाचा शरद पवार से ली। चाचा-भतीजे की जोड़ी महाराष्ट्र में लंबे समय तक राजनीतिक शक्ति का केंद्र रही। शरद पवार ने अनुशासन, काडर प्रबंधन और जनता के बीच लोकप्रियता के गुर अजित को सिखाए।

अजित पवार एनसीपी में तेज और रणनीतिक फैसलों के लिए जाने जाते थे। कहा जाता है कि यदि शरद पवार पार्टी की आत्मा हैं, तो अजित पवार उसकी काया थे। हालांकि समय के साथ उनकी सोच में अंतर आने लगा और उन्होंने शरद पवार का साथ छोड़कर अलग राजनीतिक रास्ता अपनाया।

राजनीति में उनका योगदान
अजित पवार की राजनीतिक यात्रा सहकारिता आंदोलन से डिप्टी सीएम तक रही। उनके प्रशासनिक अनुभव और रणनीतिक कौशल ने महाराष्ट्र की राजनीति में स्थायी छाप छोड़ी। उनका असमय निधन महाराष्ट्र और एनसीपी दोनों के लिए एक बड़ा झटका है।