Echo of Ganeshotsav in Gorakhpur : 87 साल पुरानी परंपरा अब शहर के हर कोने में
India News Live,Digital Desk : गणेशोत्सव की शुरुआत भले ही महाराष्ट्र से हुई हो, लेकिन अब इसकी आभा गोरखपुर को भी आलोकित कर रही है। विघ्नहर्ता भगवान गणेश की आराधना का यह पर्व यहां हर साल और भी बड़े स्तर पर मनाया जा रहा है।
शहर में सार्वजनिक रूप से इस उत्सव की नींव करीब 87 साल पहले महाराष्ट्रियन नगरकर परिवार ने रखी थी। उस समय एक छोटी-सी मूर्ति स्थापना से शुरू हुई यह परंपरा आज गोरखपुर के लगभग हर मोहल्ले तक पहुँच चुकी है। इस बार डेढ़ सौ से भी अधिक गणपति प्रतिमाएं विभिन्न जगहों पर स्थापित की जाएंगी। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मंत्रोच्चार के साथ इन मूर्तियों की स्थापना होगी।
गोरखपुर में गणेशोत्सव की पहली झलक 1901 में दिखाई दी थी। महाराष्ट्र के तुकाराम नगरकर, जो रेलवे कॉन्ट्रैक्टर थे, काम के सिलसिले में यहां आए और आर्यनगर में बस गए। यहीं उन्होंने मुंबई के प्रसिद्ध "लालबाग के राजा" की तर्ज पर गणपति की प्रतिमा स्थापित कर पूजा शुरू की।
उनके पुत्र शांताराम नगरकर (खजांची बाबू) ने 1938 में पहली बार सार्वजनिक उत्सव का आयोजन किया। आर्यनगर स्थित अग्रवाल भवन में प्रतिमा स्थापना कर उन्होंने स्थानीय लोगों को इस महोत्सव से जोड़ा। बाद में उत्सव का स्थल कई बार बदला—अग्रवाल भवन से वीनस सिनेमा, फिर पार्क रोड स्थित किर्लोस्कर कंपाउंड तक।
समय के साथ यह परंपरा और भव्य होती गई। आज स्थिति यह है कि अलग-अलग समितियां पंडालों को सजाने और आयोजन को भव्य बनाने में प्रतिस्पर्धा करती हैं। दस दिनों तक चलने वाला यह उत्सव गोरखपुर की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है।
गणेश चतुर्थी व्रत और महत्व
इस वर्ष गणेश चतुर्थी बुधवार को पड़ रही है, जिसे वैनायकी वरद श्रीगणेश चतुर्थी भी कहा जाता है। पुराणों के अनुसार, भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के मध्याह्न काल में ही श्रीगणेश का जन्म हुआ था। यही कारण है कि इस समय पूजन का विशेष महत्व है। बुधवार का दिन गणेश जी को समर्पित होने से इस बार पर्व का महत्व और भी बढ़ गया है