सोमनाथ मंदिर में बौद्ध अवशेष मिलने का दावा पड़ा भारी, गुजरात हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर ठोंका 2 लाख का जुर्माना
गुजरात के प्रभास पाटन में स्थित विश्व प्रसिद्ध प्रथम ज्योतिर्लिंग श्री सोमनाथ मंदिर परिसर को लेकर दायर की गई एक विवादित जनहित याचिका (PIL) पर गुजरात हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने मंदिर परिसर के नीचे बौद्ध धर्म से जुड़े पुरातात्विक अवशेष होने का दावा करने वाली याचिका को न सिर्फ सिरे से खारिज कर दिया, बल्कि कोर्ट का समय बर्बाद करने और भ्रामक तथ्य फैलाने के लिए याचिकाकर्ता पर 2 लाख रुपये का भारी-भरकम जुर्माना भी लगाया है। हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता को एक 'बेईमान वादी' करार दिया।
चीफ जस्टिस की बेंच ने लगाई कड़ी फटकार
इस संवेदनशील मामले की सुनवाई गुजरात हाई कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) सुनीता अग्रवाल और जस्टिस डी.एन. रे की डिवीजन बेंच में हुई। सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिकाकर्ता की नीयत पर गंभीर सवाल खड़े किए। बेंच ने कहा कि यह PIL पूरी तरह से गलत, अधूरी, मनगढ़ंत और सोशल मीडिया की अपुष्ट खबरों को तोड़-मरोड़कर पेश किए गए तथ्यों के आधार पर दायर की गई थी। कोर्ट ने माना कि ऐसी बेबुनियाद याचिकाएं न्याय व्यवस्था और वास्तविक जनहित याचिकाओं (PIL) की पवित्रता व विश्वसनीयता को गंभीर नुकसान पहुंचाती हैं।
महाराष्ट्र के शख्स ने 'छिपे हुए मकसद' से दायर की थी याचिका
इस विवादित याचिका को महाराष्ट्र के रहने वाले विलास तुकाराम खरात नाम के व्यक्ति ने दायर किया था। खरात खुद को बौद्ध धर्म का अनुयायी और 'सनातन धम्म' नामक एक एनजीओ (NGO) का संस्थापक सदस्य बताता है। याचिका में उसने श्री सोमनाथ ट्रस्ट और आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) को प्रतिवादी बनाया था।
सुनवाई के दौरान जब कोर्ट ने याचिका में प्रधानमंत्री और सोमनाथ ट्रस्ट के चेयरमैन का जिक्र करने वाले बयानों को देखा, तो कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, "याचिका में दिए गए तर्क और भाषा यह साफ दर्शाते हैं कि याचिकाकर्ता किसी नेक इरादे से नहीं, बल्कि किसी छिपे हुए राजनीतिक या व्यक्तिगत मकसद के साथ अदालत का दरवाजा खटखटा रहा है।"
सोशल मीडिया की खबरों को बना लिया याचिका का आधार
गुजरात हाई कोर्ट ने अपने लिखित आदेश में स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता ने आईआईटी गांधीनगर (IIT Gandhinagar) और एएसआई (ASI) द्वारा किए गए एक कथित वैज्ञानिक सर्वे की खबरों को आधार बनाया था, जो केवल प्रिंट और सोशल मीडिया पर तैर रही थीं।
जब कोर्ट ने याचिकाकर्ता से पूछा कि क्या उसके पास इस दावे को सच साबित करने के लिए कोई निजी शोध, प्रामाणिक दस्तावेज या पुख्ता सबूत हैं? तो याचिकाकर्ता के पास कोई जवाब नहीं था। कोर्ट ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि जानकारी मांगने के लिए संबंधित सरकारी अधिकारियों या आरटीआई (RTI) का सहारा लेने के बजाय सीधे पब्लिसिटी बटोरने के लिए कोर्ट में PIL दाखिल कर दी गई।
राज्य सरकार ने कहा— 'अनावश्यक विवाद खड़ा करने की कोशिश'
मामले की पैरवी करते हुए राज्य सरकार के वकीलों ने कोर्ट के सामने दलील दी कि इस याचिका का एकमात्र उद्देश्य बिना किसी ठोस वैज्ञानिक या ऐतिहासिक आधार के एक बेहद पवित्र और प्रतिष्ठित मंदिर ट्रस्ट को अनावश्यक विवादों में घसीटना और सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित करना था।
अदालत ने सरकार के तर्कों से सहमति जताते हुए विलास तुकाराम खरात की याचिका को खारिज कर दिया और आदेश दिया कि न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करने के एवज में वह 2 लाख रुपये का जुर्माना जमा करे।