चीन से J-10CE फाइटर जेट खरीदने की तैयारी में बांग्लादेश, तारिक रहमान सरकार का बड़ा दांव; जानिए भारत और पड़ोसियों की क्या है रणनीति?
दक्षिण एशिया की भू-राजनीति और सामरिक समीकरणों में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। पड़ोसी देश बांग्लादेश अपनी वायुसेना (Bangladesh Air Force) के आधुनिकीकरण के नाम पर चीन से अत्याधुनिक 4.5 जेनरेशन के 'चेंगदू J-10CE' (Chengdu J-10CE) मल्टीरोल फाइटर जेट और अटैक हेलीकॉप्टर खरीदने के बेहद करीब पहुंच गया है। बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान के सूचना एवं प्रसारण सलाहकार जाहिद उर रहमान ने ढाका स्थित सचिवालय में एक आधिकारिक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान इस संभावित रक्षा सौदे की पुष्टि की है। इस सौदे के तहत बांग्लादेश लगभग 24 J-10CE लड़ाकू विमानों के बेड़े को अपनी वायुसेना में शामिल करने की योजना बना रहा है, जिससे उसके पुराने पड़ चुके चीनी मूल के F-7 और सोवियत कालीन मिग-29 विमानों को रिप्लेस किया जा सके।
तारिक रहमान सरकार का रणनीतिक फैसला और ड्राफ्ट समझौते की स्थिति
ढाका में आयोजित प्रेस वार्ता के दौरान जाहिद उर रहमान ने बताया कि मल्टी-रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (MRCA) और अटैक हेलीकॉप्टर खरीद समितियों ने बीजिंग के साथ प्रारंभिक वार्ता के बाद समझौते का एक ड्राफ्ट (मसौदा) तैयार कर लिया है। इस ड्राफ्ट को अब सशस्त्र बल प्रभाग (Armed Forces Division) और संबंधित अंतर-मंत्रालयी समितियों के पास अंतिम वित्तीय व तकनीकी अनुमोदन के लिए भेजा गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि चालू वित्त वर्ष में आवश्यक बजटीय आवंटन प्राप्त हो जाता है, तो खरीद प्रक्रिया को तुरंत अंतिम रूप दिया जाएगा, अन्यथा इसे अगले वित्तीय वर्ष के रक्षा बजट में समायोजित किया जाएगा। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि प्रधानमंत्री तारिक रहमान की बीजिंग यात्रा और दोनों देशों के बीच हुए उच्च स्तरीय संपर्कों ने इस सौदे की गति को तेज कर दिया है।
राफेल से तुलना और जाहिद उर रहमान के विवादित दावे
इस रक्षा सौदे को उचित ठहराते हुए बांग्लादेशी सलाहकार जाहिद उर रहमान ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर विवादित और अपुष्ट दावे भी किए। उन्होंने दावा किया कि बांग्लादेश ने J-10 फाइटर जेट की क्षमताओं का गहन विश्लेषण किया है और भारत-पाकिस्तान के बीच हुए तनावपूर्ण हवाई टकरावों में इसकी कथित भूमिका को करीब से परखा है। हालांकि भारतीय और वैश्विक रक्षा विशेषज्ञों ने इन दावों को पूरी तरह से भ्रामक और जमीनी हकीकत से परे करार दिया है। जाहिद उर रहमान ने यूरोपीय लड़ाकू विमानों की तुलना में चीनी जेट्स को अधिक व्यावहारिक और सस्ता विकल्प बताया। उन्होंने कहा कि फ्रांस के दसॉल्ट राफेल (Dassault Rafale) या यूरोफाइटर टाइफून (Eurofighter Typhoon) जैसे पश्चिमी 4.5-जेनरेशन विमानों की तुलना में चीनी J-10CE काफी कम लागत में उपलब्ध है, जिससे बांग्लादेश की सीमित वित्तीय क्षमता पर अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा।
किफायती दाम और वायुसेना आधुनिकीकरण (Forces Goal 2030) का एजेंडा
बांग्लादेश लंबे समय से अपने सैन्य आधुनिकीकरण कार्यक्रम 'फोर्सेज गोल 2030' (Forces Goal 2030) के तहत वायुसेना, थलसेना और नौसेना की क्षमताओं को अपग्रेड करने में जुटा हुआ है। रिपोर्टों के अनुसार, पश्चिमी लड़ाकू विमानों की खरीद लागत प्रति यूनिट 100 से 120 मिलियन डॉलर से अधिक होती है, जबकि चीनी J-10CE की अनुमानित लागत लगभग 40 से 50 मिलियन डॉलर प्रति विमान बैठती है। बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था वर्तमान में मुद्रास्फीति और विदेशी मुद्रा भंडार की चुनौतियों से जूझ रही है, ऐसे में चीन द्वारा दी जा रही आसान ऋण शर्तें (Soft Loans) और दस साल का भुगतान मॉडल ढाका को आकर्षित कर रहा है। लड़ाकू विमानों के अलावा, बांग्लादेश चीन से वीआईपी हेलीकॉप्टर, आधुनिक यूएवी (UAV/ड्रोन सिस्टम) और अटैक हेलीकॉप्टर हासिल करने पर भी काम कर रहा है।
पड़ोसी देशों का क्या है गणित? भारत की सुरक्षा और पूर्वोत्तर पर क्या असर?
बांग्लादेश द्वारा चीनी फाइटर जेट्स की खरीद केवल एक द्विपक्षीय व्यापारिक सौदा नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर पूरे दक्षिण एशियाई सुरक्षा ढांचे पर पड़ना तय है। भारत के रणनीतिक दृष्टिकोण से यह कदम चिंता बढ़ाने वाला है।
तीन तरफ से J-10C की घेराबंदी: यदि बांग्लादेश इस सौदे को अंतिम रूप देता है, तो भारत के तीनों प्रमुख पड़ोसी देशों—उत्तर में चीन, पश्चिम में पाकिस्तान और पूर्व में बांग्लादेश—के पास एक ही तरह के आधुनिक चीनी लड़ाकू विमान (J-10C/J-10CE) मौजूद होंगे।
पूर्वी कमान पर हवाई दबाव: अब तक भारत की पूर्वी सीमा को रणनीतिक रूप से अपेक्षाकृत शांत और सुरक्षित माना जाता था, लेकिन ढाका में आधुनिक 4.5 जेनरेशन विमानों की तैनाती से भारतीय वायुसेना (IAF) को अपनी पूर्वी कमान में राफेल, सुखोई-30MKI और मिराज-2000 की तैनाती को और सुदृढ़ करना होगा।
रडार और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर का खतरा: J-10CE में लगा उन्नत AESA (एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे) रडार और PL-15 बियॉन्ड-विजुअल-रेंज (BVR) मिसाइलें लंबी दूरी तक हवाई लक्ष्यों को भेदने की क्षमता रखती हैं।
चिकन नेक और बंगाल की खाड़ी: रणनीतिक संतुलन बिगड़ने का खतरा
भारत का सिलीगुड़ी कॉरिडोर (जिसे 'चिकन नेक' भी कहा जाता है) भारत के मुख्य भूभाग को पूर्वोत्तर के आठ राज्यों से जोड़ता है। यह संकरा गलियारा बांग्लादेश सीमा के बेहद करीब है। यदि बांग्लादेश के हवाई अड्डों पर उन्नत चीनी लड़ाकू विमान और निगरानी प्रणालियां तैनात की जाती हैं, तो चिकन नेक और पूर्वोत्तर के महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों पर चीनी खुफिया एजेंसियों और हथियारों की सीधी नजर हो सकती है। इसके साथ ही, बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal) में स्थित भारतीय नौसेना के रणनीतिक ठिकानों और मिसाइल परीक्षण केंद्रों (जैसे चांदीपुर और एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप) के आसपास हवाई व समुद्री निगरानी का जोखिम भी बढ़ सकता है।
चीन की 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' नीति और दक्षिण एशिया में बढ़ता प्रभाव
चीन पिछले दो दशकों से बांग्लादेश का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता (Largest Arms Supplier) बना हुआ है। बांग्लादेशी सेना के 70 प्रतिशत से अधिक हथियार चीनी मूल के हैं, जिनमें टाइप 59/69 और VT-5 टैंक, फ्रिगेट्स, मिसाइल बोट्स और मिंग-क्लास पनडुब्बियां शामिल हैं। कॉक्स बाजार के पास पेकुआ में चीनी सहयोग से बने BNS शेख हसीना पनडुब्बी बेस के बाद अब J-10CE फाइटर जेट्स की खरीद से बांग्लादेशी रक्षा प्रणाली पर बीजिंग की तकनीकी और साजो-सामान (Logistics) निर्भरता और अधिक गहरी हो जाएगी। चीन अपने 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' (String of Pearls) सिद्धांत के तहत म्यांमार, श्रीलंका, पाकिस्तान और अब बांग्लादेश में अपने सैन्य पदचिह्न मजबूत करने की दीर्घकालिक रणनीति पर आगे बढ़ रहा है।
बांग्लादेश में नई भू-राजनीतिक बिसात: संतुलन या रणनीतिक बदलाव?
बांग्लादेश में राजनीतिक सत्ता परिवर्तन के बाद से अंतरिम और नई निर्वाचित सरकारें अपनी विदेश नीति को 'रणनीतिक स्वतंत्रता' के नाम पर पुनर्गठित करने का दावा कर रही हैं। हालांकि, नई दिल्ली के रणनीतिकार इस पूरे घटनाक्रम पर बारीक नजर बनाए हुए हैं। भारत अपनी वायु रक्षा प्रणाली, जिसमें S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम, स्वदेशी आकाश प्राइम और तेजस एमके-1ए शामिल हैं, को पूर्वोत्तर सीमा पर लगातार अपग्रेड कर रहा है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या बांग्लादेश भारत और पश्चिमी देशों की सामरिक चिंताओं को संतुलित करते हुए अपनी विदेश नीति चला पाता है या फिर वह चीन के रक्षा और आर्थिक चक्रव्यूह में पूरी तरह समा जाता है।