अंटार्कटिका तय करता है भारत का मानसून? 73 हजार साल के डेटा ने खोले चौंकाने वाले राज

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India News Live,Digital Desk : भारत में मानसून की दिशा और ताकत सिर्फ अरब सागर या पश्चिमी हवाओं से तय नहीं होती, बल्कि इसका सीधा कनेक्शन हजारों किलोमीटर दूर अंटार्कटिका से जुड़ा है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) और राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों ने 73 हजार वर्षों के समुद्री सतह तापमान का विश्लेषण कर यह अहम खुलासा किया है।

इस अध्ययन के मुताबिक, काशी से लेकर कन्याकुमारी तक मानसून की चाल पर दक्षिणी गोलार्ध और अंटार्कटिका की जलवायु परिस्थितियों का गहरा असर पड़ता है।

अरब सागर और अंटार्कटिका का सीधा रिश्ता

वैज्ञानिकों ने गोवा तट के पास समुद्र की गहराई से लिए गए 200 से अधिक नमूनों का अध्ययन किया। इन नमूनों के जरिए अरब सागर के तापमान में पिछले 73 हजार वर्षों में आए बदलावों को समझा गया।

शोध से सामने आया कि अरब सागर का तापमान अंटार्कटिका और दक्षिणी महासागर में होने वाले जलवायु बदलावों से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। यही तापमान बदलाव भारतीय मानसून की मजबूती और कमजोर पड़ने की दिशा तय करता है।

73 हजार साल का ‘तापमान कैलेंडर’

आर्टिफिशियल न्यूरल नेटवर्क जैसी आधुनिक तकनीकों की मदद से वैज्ञानिकों ने समुद्री सतह तापमान का विस्तृत डेटा तैयार किया। इस दौरान पता चला कि इन हजारों वर्षों में अरब सागर के तापमान में करीब 4.5 डिग्री सेल्सियस तक का उतार-चढ़ाव हुआ।

सबसे अधिक तापमान करीब 29.1 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो लगभग 31 हजार साल पहले हेनरिक स्टेडियल-3 नामक ठंडे दौर के दौरान हुआ था।

हिमयुग की घटनाओं का असर आज के मानसून पर

बीएचयू के भूविज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. अरुण देव सिंह के अनुसार, यह अध्ययन साबित करता है कि अंटार्कटिका का प्रभाव 15 डिग्री उत्तरी अक्षांश तक, यानी अरब सागर के ऊपरी जल-स्तर तक पहुंचता है।

इसका मतलब यह है कि हिमयुग और अंतर-हिमयुग जैसी प्राचीन घटनाएं आज भी हिंद महासागर के तापमान और भारतीय मानसून को प्रभावित कर रही हैं।

खारापन, बारिश और पश्चिमी घाट का कनेक्शन

शोध में समुद्र के खारेपन और पश्चिमी घाटों में होने वाली वर्षा के बीच भी मजबूत संबंध पाया गया है। यह दर्शाता है कि भारतीय मानसून सिर्फ स्थानीय मौसम तंत्र पर निर्भर नहीं है, बल्कि यह एक वैश्विक जलवायु प्रणाली का हिस्सा है।

अंटार्कटिका और दक्षिणी महासागर में होने वाले बदलाव पहले हिंद महासागर के तापमान को प्रभावित करते हैं और फिर इसका असर भारत की बारिश पर पड़ता है।

भविष्य की सटीक मानसून भविष्यवाणी में मददगार

वैज्ञानिकों का मानना है कि यह शोध भविष्य में ग्लोबल वॉर्मिंग के असर को समझने और मानसून की अधिक सटीक भविष्यवाणी करने में बेहद उपयोगी साबित होगा।

यह अध्ययन दिसंबर 2025 में नीदरलैंड के प्रतिष्ठित एल्सेवियर जर्नल Palaeogeography, Palaeoclimatology, Palaeoecology में प्रकाशित हुआ है और इसे वैश्विक जलवायु विज्ञान के क्षेत्र में एक अहम कड़ी माना जा रहा है।