A confluence of North and South at the Sahitya Akademi : तथागत साहित्य पुरस्कार से मजबूत हुआ भाषाई संवाद

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India News Live,Digital Desk : शनिवार, 24 जनवरी, 2026 को राजधानी के प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी सभागार में भारतीय साहित्य में सांस्कृतिक और भाषाई एकता का एक उल्लेखनीय संगम देखने को मिला। तथागत साहित्य पुरस्कार समारोह साहित्य के माध्यम से उत्तर और दक्षिण भारत के बीच की खाई को पाटने का एक सफल प्रयास था। इस वर्ष ये पुरस्कार केरल के वरिष्ठ हिंदी साहित्यकार प्रोफेसर ए. अरविंदाक्षण और अरुणाचल प्रदेश की प्रतिभाशाली युवा कवयित्री जमुना बिनी को प्रदान किए गए।

समारोह का शुभारंभ महान कवि सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला" की कालजयी रचना "वरदे वीणावादिनी" पर आधारित भावपूर्ण कथक प्रस्तुति से हुआ। भव्य समारोह की अध्यक्षता करते हुए तथागत ट्रस्ट के संरक्षक और पूर्व आईएएस अधिकारी डॉ. एन.पी. सिंह ने ट्रस्ट के उद्देश्य को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा, "तथागत ट्रस्ट का उद्देश्य केवल पुरस्कार देना नहीं, बल्कि उत्तर और दक्षिण भारत के बीच भाषा और संस्कृति का निरंतर संवाद स्थापित करना है।" उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह पुरस्कार प्रसिद्ध साहित्यकार रामदर्श मिश्रा की स्मृति को समर्पित है, जिन्होंने अपने पूरे जीवन में मानवीय संवेदनाओं को बढ़ावा दिया।

साहित्यिक योगदानों पर चर्चा

हिंदी साहित्य जगत की कई प्रमुख हस्तियों ने इस कार्यक्रम में भाग लिया। अनामिका, अशोक वाजपेयी, ओम निश्चल और चंद्रकांता जैसे विद्वानों ने पुरस्कार विजेता लेखकों की रचनाओं पर प्रकाश डाला।

प्रोफेसर ए. अरविंदक्षण: वक्ताओं ने उनकी रचना "धड़कनों के भीतर जाकर" पर चर्चा करते हुए कहा कि अरविंदक्षण ने न केवल हिंदी को दक्षिण भारतीय संदर्भ के अनुकूल ढाला बल्कि इसे एक नई भावनात्मक गहराई भी दी।

जमुना बिनी: अरुणाचल प्रदेश की मिट्टी की सुगंध बिखेरने वाली जमुना बिनी की कविता संग्रह "जब आदिवासी गता है" को विशेष सराहना मिली। विद्वानों के अनुसार, उनकी कविताएँ आदिवासी चेतना, जल, वन और भूमि के लिए संघर्ष और हाशिए पर पड़े समुदायों की सशक्त आवाज हैं।

सहानुभूति और मानवता का एक सेतु

समापन सत्र में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि आज के विभाजनकारी समाज में, ऐसे आयोजन भारतीय साहित्य में संवाद और मानवता को मजबूत करने का काम करते हैं। पुरस्कार समारोह न केवल दोनों लेखकों को श्रद्धांजलि थी, बल्कि हिंदी के माध्यम से पूर्वोत्तर की पहाड़ियों और दक्षिण के तटीय क्षेत्रों को जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण वैचारिक अनुष्ठान भी था। इस कार्यक्रम में दिल्ली से बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी, शोधकर्ता और पत्रकार शामिल हुए, जिन्होंने इस भाषाई सुलह को भारतीय अखंडता के लिए एक शुभ संकेत बताया।